एकादश सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 12

एकादश सर्ग -साकेत-मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Saket Part 12

एकादश सर्ग

जयति कपिध्वज के कृपालु कवि, वेद-पुराण-विधाता व्यास;
जिनके अमरगिराश्रित हैं सब धर्म, नीति, दर्शन, इतिहास!

बरसें बीत गईं, पर अब भी है साकेत पुरी में रात,
तदपि रात चाहै जितनी हो, उसके पीछे एक प्रभात।

ग्रास हुआ आकाश, भूमि क्या, बचा कौन अँधियारे से?
फूट उसी के तनु से निकले तारे कच्चे पारे-से!
विकच व्योम-विटपी को मानों मृदुल बयार हिलाती है;
अंचल भर-भर कर मुक्ता-फल खाती और खिलाती है!
सौध-पार्श्व में पर्णकुटी है, उसमें मन्दिर सोने का,
जिसमें मणिमय पादपीठ है, जैसा हुआ न होने का।
केवल पादपीठ, उस पर हैं पूजित युगल पादुकाएँ,
स्वयं प्रकाशित रत्न-दीप हैं दोनों के दायें-बायें।
उटज-अजिर में पूज्य पुजारी उदासीन-सा बैठा है,
आप देव-विग्रह मन्दिर से निकल लीन-सा बैठा है।
मिले भरत में राम हमें तो, मिलें भरत को राम कभी;
वही रूप है, वही रंग है, वही जटाएँ, वही सभी!
बायीं ओर धनुष की शोभा, दायीं ओर निषंग-छटा,
वाम पाणि में प्रत्यंचा है, पर दक्षिण में एक जटा!
“आठ मास चातक जीता है अपने घन का ध्यान किये;
आशा कर निज घनश्याम की हमने बरसों बिता दिये!’

सहसा शब्द हुआ कुछ बाहर, किन्तु न टूटा उनका ध्यान,
कब आ पहुँची वहाँ माण्डवी, हुआ न उनको इसका ज्ञान।
चार चूड़ियाँ थीं हाथों में, माथे पर सिन्दूरी बिन्दु,
पीताम्बर पहने थी सुमुखी, कहाँ असित नभ का वह इन्दु?
फिर भी एक विषाद वदन के तपस्तेज में पैठा था,
मानों लौह-तन्तु मोती को बेध उसी में बैठा था।
वह सोने का थाल लिए थी, उस पर पत्तल छाई थी,
अपने प्रभु के लिए पुजारिन फलाहार सज लाई थी।
तनिक ठिठक, कुछ मुड़कर दायें, देख अजिर में उनकी ओर,
शीस झुकाकर चली गई वह मन्दिर में निज हृदय हिलोर।
हाथ बढ़ाकर रक्खा उसने पादपीठ के सम्मुख थाल,
टेका फिर घुटनों के बल हो द्वार-देहली पर निज भाल।
टपक पड़ीं उसकी आँखों से बड़ी बड़ी बूँदें दो-चार,
दूनी दमक उठीं रत्नों की किरणें उनमें डुबकी मार!
यही नित्य का क्रम था उसका, राजभवन से आती थी,
स्वश्रु-सुश्रूषिणी अन्त में पति-दर्शन कर जाती थी।

उठ धीरे, प्रिय-निकट पहुँच कर, उसने उन्हें प्रणाम किया,
चौंक उन्होंने, सँभल ‘स्वस्ति’ कह, उसे उचित सम्मान दिया।
“जटा और प्रत्यंचा की उस तुलना का क्या फल निकला?”
हँसने की चेष्टा करके भी हा! रो पड़ी वधू विकला।
“यह विषाद भी प्रिये, अन्त में स्मृति-विनोद बन जावेगा,
दूर नहीं अब अपना दिन भी, आने को है, आवेगा।”
“स्वामी, तदपि आज हम सबके मन क्यों रो रो उठते हैं,
किसी एक अव्यक्त आर्त्ति से आतुर हो हो उठते हैं।”
“प्रिये, ठीक कहती हो तुम यह, सदा शंकिनी आशा है,
होकर भी बहु चित्र-अंकिनी आप रंकिनी आशा है।
विस्मय है, इतनी लम्बी भी अवधि बीतने पर आई,
खड़ा न हो फिर नया विघ्न कुछ, स्वयं सभय चिन्ता छाई।
सुनो, नित्य जन-मनःकल्पना नया निकेत बनाती है,
किन्तु चंचला उसमें सुख से पल भर बैठ न पाती है।
सत्य सदा शिव होने पर भी, विरुपाक्ष भी होता है,
और कल्पना का मन केवल सुन्दरार्थ ही रोता है।
तो भी अपने प्रभु के ऊपर है मुझको पूरा विश्वास,
आर्य कहीं हों, किन्तु आर्य के दिये वचन हैं मेरे पास।
रोक सकेगा कौन भरत को अपने प्रभु को पाने से?
टोक सकेगा रामचन्द्र को कौन अयोध्या आने से?”
“नाथ, यही कह कर माँओं को किसी भाँति कुछ खिला सकी,
पर उर्मिला बहन को यह मैं आज न जल भी पिला सकी।
‘कहाँ और कैसे होंगे वे?’-कह कर माँएँ रोती हैं,
‘काँटे उन्हें कसकते होंगे’-रह रह धीरज खोती हैं!
किन्तु बहन के बहने वाले आँसू भी सूखे हैं आज,
वरुनी के वरुणालय भी वे अलकों-से रूखे हैं आज!
उनके मुहँ की ओर देख कर आग्रह आप ठिठकता है,
कहना क्या, कुछ सुनने में भी हाय! आज वह थकता है।
दीन-भाव से कहा उन्होंने-‘बहन, एक दिन बहुत नहीं,
बरसों निराहार रह कर ये आँखें क्या मर गईं कहीं?’
विवश लौट आई रोकर मैं, लाई हूँ नैवेद्य यहाँ,
‘आता हूँ मैं’-कह कर देवर गये उन्हीं के पास वहाँ।”
सनिःश्वास तब कहा भरत ने-“तो फिर आज रहे उपवास।”
“पर प्रसाद प्रभु का?” यह कहकर हुई माण्डवी अधिक उदास।
“सब के साथ उसे लूँगा मैं, बीते,-बीत रही है रात,
हाय! एक मेरे पीछे ही हुआ यहाँ इतना उत्पात!
एक न मैं होता तो भव की क्या असंख्यता घट जाती?
छाती नहीं फटी यदि मेरी, तो धरती ही फट जाती!”
“हाय! नाथ, धरती फट जाती, हम तुम कहीं समा जाते,
तो हम दोनों किसी तिमिर में रह कर कितना सुख पाते।
न तो देखता कोई हमको, न वह कभी ईर्ष्या करता,
न हम देखते आर्त्त किसी को, न यह शोक आँसू भरता।
स्वयं परस्पर भी न देख कर करते हम सब अंगस्पर्श,
तो भी निज दाम्पत्य-भाव का उसे मानती मैं आदर्श।
कौन जानता किस आकर में पड़े हृदय रूपी दो रत्न?
फिर भी लोग किया करते हैं उनकी आशा पर ही यत्न।
ऐसे ही अगणित यत्नों से तुम्हें जगत ने पाया है,
उस पर तुम्हें न हो, पर उसको तुम पर ममता-माया है।
नाथ, न तुम होते तो यह व्रत कौन निभाता, तुम्हीं कहो?
उसे राज्य से भी महार्ह धन देता आकर कौन अहो!
मनुष्यत्व का सत्व-तत्व यों किसने समझा-बूझा है?
सुख को लात मार कर तुम-सा कौन दुःख से जूझा है?
खेतों के निकेत बनते हैं और निकेतों के फिर खेत,
वे प्रासाद रहें न रहें, पर, अमर तुम्हारा यह साकेत।
मेरे नाथ, जहाँ तुम होते दासी वहीं सुखी होती;
किन्तु विश्व की भ्रातृ-भावना यहाँ निराश्रित ही रोती।
रह जाता नरलोक अबुध ही ऐसे उन्नत भावों से,
घर घर स्वर्ग उतर सकता है प्रिय, जिनके प्रस्तावों से।
जीवन में सुख दुःख निरन्तर आते जाते रहते हैं,
सुख तो सभी भोग लेते हैं, दुःख धीर ही सहते हैं।
मनुज दुग्ध से, दनुज रुधिर से, अमर सुधा से जीते हैं,
किन्तु हलाहल भव-सागर का शिव-शंकर ही पीते हैं।
धन्य हुए हम सब स्वधर्म की जिस इस नई प्रतिष्ठा से,
समुत्तीर्ण होंगे कितने कुल इसी अतुल की निष्ठा से।
हमें ऐतिहासिक घटनाएँ जो शिक्षा दे जाती हैं,
स्वयं परीक्षा लेने उसकी लौट लौट कर आती हैं।
अब कै दिन के लिए खेद यह, जब यह दुख भी चला चला?
सच कहती हूँ, यह प्रसंग भी मुझको जाते हुए खला!”

“प्रिये, सभी सह सकता हूँ मैं, पर असह्य तुम सबका ताप।”
“किन्तु नाथ, हम सबने इसको लिया नहीं क्या अपने आप?
भूरि-भाग्य ने एक भूल की, सबने उसे सँभाला है,
हमें जलाती, पर प्रकाश भी फैलाती यह ज्वाला है।
कितने कृती हुए, पर किसने इतना गौरव पाया है?
मैं तो कहती हूँ, सुदैव ही यहाँ दुःख यह लाया है!
व्यथा-भरी बातों में ही तो रहता है कुछ अर्थ भरा,
तप में तप कर ही वर्षा में होती है उर्वरा धरा।
लो, देवर आ गये, उन्हीं के घोड़े की ये टापें हैं,
सुदृढ़ मार्ग पर भी द्रुतलय में यथा मुरज की थापें हैं।
राजनीति बाधक न बने तो तनिक और ठहरूँ इस ठौर?”
“सो कुछ नहीं, किन्तु भृत्यों को प्रिये, कष्ट ही होगा और।”
“उन्हें हमारे सुख से बढ़कर नाथ, नहीं कोई सन्तोष,
सदा हमारे दुःखों पर जो देते हैं अपने को दोष।”

आकर-“लघु कुमार आते हैं”-बोली नत हो प्रतिहारी,
“आवें” कहा भरत ने, तत्क्षण आये वे धन्वाधारी।
कृश होकर भी अंग वीर के सुगठित शाण-चढ़े-से थे,
सरल वदन के विनय-तेज युग मिलकर अधिक बढ़े-से थे।
दोनों ओर दुकूल फहरता, निकले थे मानों दो पक्ष,
उड़ कर भी सुस्फूर्ति-मूर्ति वे ला सकते थे अपना लक्ष!
आकर किया प्रणाम उन्होंने, दोनों ने आशीष दिया,
मुख का भाव देख कर उनका सुख पाया, सन्तोष किया।
“कोई तापस, कोई त्यागी, कोई आज विरागी हैं,
घर सँभालने वाले मेरे देवर ही बड़भागी हैं!”
मुसकाकर तीनों ने क्षण भर पाया वर विनोद-विश्राम,
अनुभव करता था अपने में चित्रकूट का नन्दिग्राम।

बोले तब शत्रुघ्न भरत से-“आर्य, कुशलता है पुर में,
प्रभु की स्वागत-सज्जा की ही उत्सुकता सब के उर में।
अपने अतुलित जनपद की जो आकृति मात्र रही थी शेष,
नव्य-भव्य वर्णों का उसमें होता है अब पुनरुन्मेष।
वह अनुभूति-विभाग आपका बढ़ता है विभूति पाकर,
लिखते हैं लोगों के अनुभव लेखक जहाँ तहाँ जाकर।
करते है ज्ञानी-विज्ञानी नित्य नये सत्यों का शोध,
और सर्वसाधारण उनसे बढ़ा रहे हैं निज निज बोध।
नूतन वृत्तों में कवि-कोविद नये गीत रच लाते हैं,
नव रागों में, नव तालों में, गायक उन्हें जमाते हैं।
नये नये साजों-बाजों की शिल्पकार करते हैं सृष्टि,
गूढ़ रहस्यों पर ही प्रतिभा डाल रही है अपनी दृष्टि।
नई नई नाटक-सज्जाएँ सूत्रधार करते हैं नित्य,
और ऐन्द्रजालिक भी अपना भरते है अद्भुत साहित्य।
चित्रकार नव नव दृश्यों को ऐसा अंकित करते हैं,
आनन्दित करने के पहले जो कुछ शंकित करते हैं।”
कहा माण्डवी ने-“उलूक भी लगता है चित्रस्थ भला,
सुन्दर को सजीव करती है, भीषण को निर्जीव कला।”
“वैद्य नवीन वनस्पतियों से प्रस्तुत करते हैं नव योग,
जिनके गन्धस्पर्श मात्र से मिटें गात्र के बहु विध रोग।
सौगन्धिक नव नव सुगन्धियाँ प्रभु के लिए निकाल रहे,
माली नये नये पौधों को उद्यानों में पाल रहे।
एक शाल में बहु विभिन्न दल और विविध वर्धित फल-फूल,
यथा विचित्र विश्व-विटपी में अगणित विटप, एक ही मूल!
तन्तुवाय बुन बना रहे हैं नये नये बहु पट परिधान,-
रखने में फूलों के दल-से, फैलाने में गन्ध-समान!
स्वर्णकार कितने प्रकार से करते हैं मणि-कांचन-योग,
चमत्कार के ही प्रसार में लगे चाव से हैं सब लोग।
गल गल कर ढल रहीं धातुएँ पिघल महानल में जल ज्यों,
हुए टाँकियों के कौशल से उपल सुकोमल उत्पल ज्यों!
फूल-पत्तियों से भूषित हैं फिर सजीव-से नीरस दारु,
कारु-कुशलताएँ हैं अथवा उनकी पूर्वस्मृतियाँ चारु!
वसुधा-विज्ञों ने कितनी ही खोजी नई नई खानें,
पड़े धूलि में होंगे फिर भी कितने रत्न बिना जानें।
श्रमी कृषक निज बीज-वृद्धि का रखते हैं जीवित इतिहास,
राज-घोष में देखा मैं ने आज नया गोवंश-विकास।
विभु की बाट जोहते हैं सब ले ले कर अपने उपहार,
दे देकर निज रचनाओं को नव नव अलंकार-शृंगार।
करा रहे ऊर्जस्वल बल से नित्य नवल कौशल का मेल,
साध रहे हैं सुभट विकट बहु भय-विस्मय-साहस के खेल।
करके नये नये शस्त्रों से नये नये लक्षों को विद्ध,
विविध युद्ध-कौशल उपजा कर करते हैं सैनिकजन सिद्ध।”
कहा माण्डवी ने-“क्या यों ही सच्चे कलह कहीं हम हैं?
हा! तब भी सन्तुष्ट न होकर लगे कल्पना में हम हैं।”
“प्रिये, तुम्हारी सेवा का सुख पाने को ही यह श्रम सर्व,
वीरों के व्रण को बधुओं की स्नेह-दृष्टि का ही चिरगर्व।”
“हाय! हमारे रोने का भी रखते हैं नर इतना मूल्य!”
“हाँ भद्रे, वे नहीं जानते, हँसने का है कितना मूल्य?”
“किन्तु नाथ, मुझको लगती है कलह-मूर्त्ति ही अपनी जाति,
आत्मीयों को भी आपस में हमीं बनातीं यहाँ अराति।”
“आर्ये, तब क्या कहतीं हो तुम यहाँ न होतीं माताएँ?
होता कुछ भी वहाँ कहाँ से जहाँ न होतीं माताएँ?
नहीं कहीं गृह-कलह प्रजा में, हैं सन्तुष्ट तथा सब शान्त,
उनके आगे सदा उपस्थित दिव्य राज-कुल का दृष्टान्त।
अन्न-वृद्धि से तृप्त तथा बहु-कला सिद्धि से सहज प्रसन्न,
अपना ग्राम ग्राम है मानों एक स्वतन्त्र देश समपन्न।
बाध्य हुआ था जो नृप-मण्डल देख हमारी अविचल शक्ति,
साध्य मानता है अब हमको, रखता है मैत्री क्या, भक्ति।
अवधि-यवनिका उठे आर्य, तो देखेंगे पुर के सब वृद्ध-
प्रभु को आप राज्य सौंपेंगे पहले से भी अधिक समृद्ध।”

“सेंत-मेंत के यश का भागी प्रिये, तुम्हारा है भर्त्ता,
करके स्वयं तुम्हारे देवर, कहते हैं मुझको कर्त्ता!”
“नाथ, देखती हूँ इस घर में मैं तो इसमें ही सन्तोष,
गुण अर्पण करके औरों को लेना अपने सिर सब दोष।”

“आर्य, तराई से आया है एक श्वेत शोभन गज आज,
प्रभु के स्वागतार्थ उसके मिष समुपस्थित मानों गिरिराज!
सहज सुगति वह, किन्तु निषादी उसे और शिक्षा देंगे,
प्रभु के आने तक वे उसको उत्सव-योग्य बना लेंगे।”

“अनुज, सुनाते रहो सदा तुम मुझको ऐसे ही संवाद,
सुनों, मिला है हमें और भी हिमगिरि का कुछ नया प्रसाद।
मानसरोवर से आये थे सन्ध्या समय एक योगी,
मृत्युंजय की ही यह निश्चय मुझ पर कृपा हुई होगी।
वे दे गये मुझे वह ओषधि संजीवनी नाम जिसका,
क्षत-विक्षत जन को भी जीवन देना सहज काम जिसका।
किया उसे संस्थापित मैंने चरण-पादुकाओं के पास,
फैल रही यह सुरभि उसी की, करती है वह विभा-विकास।”

“आर्य, सभी शुभ लक्षण हैं, पर मन में खटक रहा है कुछ,
निकल निकल कर भी काँटे-सा उसमें अटक रहा है कुछ।
लाकर दूर दूर से अपने प्रभु के लिए भेट सस्नेह,
जल-थल से पुर के व्यवसायी लौट रहे हैं निज निज गेह।
आज एक ऐसे ही जन ने मुझको यह संवाद दिया,
सब के लिए अगम दक्षिण का पथ प्रभु ने है सुगम किया।
शान्त, सदय मुनियों को उद्धत राक्षस वहाँ सताते थे,
धर्म-कर्म के घातक होकर उनको खा तक जाते थे।
आर्ये, सिहर उठीं तुम सुन कर हुआ किन्तु अब उनका त्राण,
रहते हैं लेकर ही अथवा देकर ही प्राणों को प्राण!
प्रभु के शरण हुए कुछ ऋषि-मुनि कह कर कष्ट-कथा सारी,
सफल समझ अपना वन आना द्रवित हुए वे भयहारी।
अत्रि और अनसूया ने तब उनको आर्शीवाद दिया,
दिव्य वसन-भूषण आर्या को दे बेटी-सा विदा किया।
दण्डक वन में जाकर प्रभु ने लिया धर्म-रक्षा का भार,
दिया अश्रु-जल हत मुनियों को उनका अस्थि-समूह निहार।
बाधक हुआ विराध मार्ग में, झपटा आर्या पर पाषण्ड;
जीता हुआ गाड़ देना ही समुचित था उस खल का दण्ड।”
“हाय अभागे!””सचमुच भाभी, अच्छा हो अरि का भी अन्त,
किन्तु स्वयं माँगा था उसने मुक्ति-हेतु यह दण्ड दुरन्त।
मिल शरभंग, सुतीक्ष्ण आदि से आर्य अगस्त्याश्रम आये,
कौशिक-सम दिव्यास्त्र उन्होंने उन मुनिवर से भी पाये।
गोदावरी-तीर पर प्रभु ने दण्डक वन में वास किया,
अपनी उच्च आर्य-संस्कृति ने वहाँ अबाध विकास किया।
राक्षसता उनको विलोक कर थी लज्जा से लोहित-सी,
शूर्पणखा रावण की भगिनी पहुँची वहाँ विमोहित-सी।”
हँसी माण्डवी-“प्रथम ताड़का, फिर यह शूर्पणखा नारी,
किसी बिड़ालाक्षी की भी अब आने वाली है बारी!”
“उनमें भी सुलोचनाएँ हैं और प्रिये, हम में भी अन्ध।”
“नाथ, क्यों नहीं,-तभी न अब यह जुड़ता है उनसे सम्बन्ध!-
हाँ देवर, फिर?” “भाभी, आगे हुआ सभी रस-भाव विवर्ण,
आर्या को खाने आई वह-गई कटा कर नासा-कर्ण।

इसके पीछे उस कुटीर पर घिरी युद्ध की घोर घटा,
निशाचरों का गर्जन-तर्जन, शस्त्रों की वह तड़िच्छटा।
अभय आर्य ने इन्द्रचाप-सा चाप चढ़ा कर छोड़े बाण,
रहा राक्षसों के शोणित की वर्षा का फिर क्या परिमाण?
निज संस्कृति-समान आर्या की अग्रज रक्षा करते थे,
और प्रहरणों से प्रभुवर के रण में रिपु-गण मरते थे।
बहु संख्यक भी वैरि जनों में उन गतियों से खेले वे,
दीख पड़े सबको असंख्य-से होकर आप अकेले वे!
दूषण को सह सकते कैसे स्वयं सगुण धन्वाधारी,
खर था खर, पर उनके शर थे प्रखर पराक्रम-विस्तारी।
व्रण-भूषण पाकर विजयश्री उन विनीत में व्यक्त हुई,
निकल गये सारे कंटक-से व्यथा आप ही त्यक्त हुई।
जय जयकार किया मुनियों ने, दस्युराज यों ध्वस्त हुआ,
आर्य-सभ्यता हुई प्रतिष्टित, आर्य-धर्म आश्वस्त हुआ।
होते हैं निर्विघ्न यज्ञ अब जप-समाधि-तप-पूजा-पाठ,
यश गाती हैं मुनि-कन्याएँ, कर व्रत-पर्वोत्सव के ठाठ।”
“धन्य” भरत बोले गद्गद हो-“दूर विकृति वैगुण्य हुआ,
उस तपस्विनी मेरी माँ का आज पाप भी पुण्य हुआ।
तदपि राक्षसों के विरोध की हुई मुझे नूतन शंका,
विश्रुत बली-छली है रावण, सोने की जिसकी लंका।”
“नाथ, बली हो कोई कितना, यदि उसके भीतर है पाप,
तो गजभुक्तकपित्थ-तुल्य वह निष्फल होगा अपने आप।”
“प्रिये, ठीक है, किन्तु हमें भी करना है कर्त्तव्य-विचार,
जलते जलते भी अधमेन्धन छिटकाता है निज अंगार।
हत वैरी का भी क्या हमको करना पड़ता नहीं प्रबन्ध,
जिसमें सड़ कर उसका शव भी फैलावे न कहीं दुर्गन्ध।
पुण्य लाभ करने से भी है पाप काटना कठिन कठोर,
कुसुम-चयन-सा सहज नहीं है काँटों से बचना उस ओर।
पुर्व पुण्य के क्षय होने तक पापी भी तो दुर्जय है,
सरला-अबला आर्या ही के लिए आज मुझको भय है।
मायावी राक्षस-वह देखो!” चौंक वीरवर ने थोड़ा,
दीख न पड़ा उठा कर धन्वा कब शर जोड़ा, कब छोड़ा।

“हा लक्ष्मण! हा सीते!” दारुण आर्त्तनाद गूँजा ऊपर,
और एक तारक-सा तत्क्षण टूट गिरा सम्मुख भू पर।
चौंक उठे सब “हरे! हरे!” कह-“हा! मैंने किसको मारा?”
आहत जन के शोणित पर ही गिरी भरत-रोदन-धारा।
दौड़ पड़ीं बहु दास-दासियाँ, मूर्च्छित-सा था वह जन मौन,
भरत कह रहे थे सहला कर-“बोलो भाई, तुम हो कौन?”
कहा माण्डवी ने तब बढ़ कर-“अब आतुरता ठीक नहीं,
संजीवनी महोषधि की हो नाथ, परीक्षा क्यों न यहीं?”
“साधु-साधु” कह स्वयं भरत ही जाकर उसको ले आये,
चमत्कार था नये प्राण-से उस आहत जन ने पाये।
आँखें खोल देखती थी वह विकट मूर्ति हट्टी-कट्टी,
अपना अंचल फाड़ माण्डवी उसे बाँधती थी पट्टी!
“अहा! कहाँ मैं, क्या सचमुच ही तुम मेरी सीता माता?
ये प्रभु हैं, ये मुझे गोद में लेटाये लक्ष्मण भ्राता?”
“तात! भरत, शत्रुघ्न, माण्डवी हम सब उनके अनुचारी;
तुम हो कौन, कहाँ, कैसे हैं वे खर-दूषण-संहारी?”
चौंक वीर उठ खड़ा हो गया, पूछा उसने-“कितनी रात?”
“अर्द्धप्राय” “कुशल है तब भी, अब भी है वह दूर प्रभात।
धन्य भाग्य, इस किंकर ने भी उनके शुभ दर्शन पाये,
जिनकी चर्चा कर सदैव ही प्रभु के भी आँसू आये।
मेरे लिए न आतुर हो तुम, कहाँ पार्श्व का अब वह घाव?
अम्बा के इस अंचल-पट में पुलकित मेरा चिर-शिशु-भाव!

आंजनेय को अधिक कृती उन कार्त्तिकेय से भी लेखो,
माताएँ ही माताएँ हैं जिसके लिए जहाँ देखो।
पर विलम्ब से हानि, सुनो मैं हनूमान, मारुति, प्रभुदास,
संजीवनी-हेतु जाता हूँ योग-सिद्धि से उड़ कैलास।”
“प्रस्तुत है वह यहीं, उसी से प्रियवर, हुआ तुम्हारा त्राण।”
“आहा! मेरे साथ बचाये तुमने लक्ष्मण के भी प्राण।
थोड़े में वृतान्त सुनो अब खर-दूषण-संहारी का,
तुम्हें विदित ही है वह विक्रम उन दण्डक वन-चारी का।

हरी हरी वनधरा रुधिर से लाल हुई हलकी होकर,
शूर्पणखा लंका में पहुँची, रावण से बोली रोकर-
‘देखो, दो तापस मनुजों ने कैसी गति की है मेरी,
उनके साथ एक रमणी है, रति भी हो जिसकी चेरी।
भरतखण्ड के दण्डक वन में वे दो धन्वी रहते हैं,
स्वयं पुनीत-नहीं, पावन बन, हमें पतित जन कहते हैं।’
शूर्पणखा की बातें सुन कर क्षुब्ध हुआ रावण मानी,
वैर-शुद्धि के मिष उस खल ने सीता हरने की ठानी।
तब मारीच निशाचर से वह पहले कपट मंत्र करके,
उसे साथ ले दण्डक वन में आया साधु-वेश धरके।
हेम-हरिण बन गया वहाँ पर आकर मायावी मारीच,
श्रीसीता के सम्मुख जाकर लगा लुभाने उनको नीच।
मर्म समझ हँस कर प्रभु बोले-‘सब सुचर्म पर मरते हैं!
इसे मार हम प्रिये, तुम्हारी इच्छा पूरी करते हैं।
भाई, सावधान!’ यह कह कर और धनुष पर रख कर बाण,
उस कुरंग के पीछे प्रभु ने क्रीड़ा पूर्वक किया प्रयाण।
अरुण-रूप उस तरुण हरिण की देख किरण-गति, ग्रीवाभंग,
सकरुण नरहरि राम रंग से गये दूर तक उसके संग।
समझ अन्त में उसका छल जो छोड़ा इधर उन्होंने बाण,
‘हा लक्ष्मण! हा सीते,’ कह कर छोड़े उधर छली ने प्राण।
सुन कर उसकी कातरोक्ति वह चंचल हुईं चौंक सीता,
क्या जाने प्रभु पर क्या बीती, वे हो उठीं महा भीता।
लक्ष्मण से बोलीं-‘शुभ लक्षण! यह पुकार कैसी है हाय!
जाओ, झट पट जाकर देखो, आर्यपुत्र जैसी है हाय!’
लक्ष्मण ने समझाया उनको-‘भाभी भय न करो मन में,
कर सकता है कौन आर्य का अहित तनिक भी त्रिभुवन में।
तुम कहती हो-पर यह मेरा दक्षिण नेत्र फड़कता है,
आशंका-आतंक-भाव से आतुर हृदय धड़कता है।
तदपि मुझे उनके प्रभाव का है इतना विस्तृत विश्वास,
हिलता नहीं केश तक मेरा, क्या प्रकम्प है, क्या निश्वास।’
‘किन्तु तुम्हारे ऐसे निर्मम प्राण कहाँ से मैं लाऊँ?
और कहाँ तुम-सा जड़ निर्दय यह पाषाण हृदय पाऊँ?’
कहा क्रुद्ध होकर देवी ने-‘घर बैठो तुम, मैं जाऊँ;
जो यों मुझे पुकार रहा है, किसी काम उसके आऊँ।
क्या क्षत्रिया नहीं मैं बोलो, पर तुम कैसे क्षत्रिय हो?
इतने निष्क्रिय होकर भी जो बनते यों स्वजनप्रिय हो।’
‘हा! आर्ये, प्रिय की अप्रियता करने को कहती हो तुम,
यदि न करूँ मैं तो गृहिणी की भाँति नहीं रहती हो तुम।
मैं कैसा क्षत्रिय हूँ, इसको तुम क्या समझोगी देवी,
रहा दास ही और रहूँगा सदा तुम्हारा पद-सेवी।
उठा पिता के भी विरुद्ध मैं, किन्तु आर्य-भार्या हो तुम,
इससे तुम्हें क्षमा करता हूँ, अबला हो, आर्या हो तुम!
नहीं अन्ध ही, किन्तु बधिर ही, अबला बधुओं का अनुराग;
जो हो, जाता हूँ मैं, पर तुम करना नहीं कुटी का त्याग।
रहना इस रेखा के भीतर, क्या जानें अब क्या होगा,
मेरा कुछ वश नहीं, कर्म-फल कहाँ न कब किसने भोगा?’
कसे निषंग पीठ पर प्रस्तुत और हाथ में धनुष लिये,
गये शीघ्र रामानुज वन में आर्त्त-नाद को लक्ष किये।
शून्याश्रम से इधर दशानन, मानों श्येन कपोती को,
हर ले चला विदेहसुता को-भय से अबला रोती को!
कह सशोक ‘हा!’ दोनों भाई लगे सकोप पटकने हाथ,
रोने लगी माण्डवी-“जीजी, तुम से तो उर्मिला सनाथ!”
आगे सुनने को आतुर हो सबने यह आघात सहा,
हनूमान ने धीरज देकर शीघ्र शेष वृत्तान्त कहा-
“चिल्ला तक न सकीं घबरा कर वे अचेत हो जाने से,
भाँय भाँय कर उठा किन्तु वन निज लक्ष्मी खो जाने से।
वृद्ध जटायु वीर ने खल के सिर पर उड़ आघात किया,
उसका पक्ष किन्तु पापी ने काट केतु-सा गिरा दिया।
गया जटायु इधर सुरपुर को उधर दशानन लंका को,
क्या विलम्ब लगता है आते आपद को, आशंका को?
जाकर खुला शून्य पिंजर-सा दोनों ने आश्रम देखा,
देवी के बदले बस उनका विभ्रम देखा, भ्रम देखा।
‘प्रिये, प्रिये, उत्तर दो, मैं ही करता नहीं पुकार अभंग,
शून्य कुंज-गिरि-गुहा-गर्त्त भी तुम्हें पुकार रहे हैं संग!’
लक्ष्मण ने, मैंने भी देखा, सोती थी जब सारी सृष्टि,
एक मेघ उठ-‘सीते! सीते!’ गरज गरज करता था वृष्टि।
उनके कुसुमाभरण मार्ग में थे जिस ओर पड़े उच्छिन्न,
उन्हें बीनते हुए विलपते चले खोज करते वे खिन्न।
‘जिनके अलंकार पाये हैं, आर्य उन्हें भी पावेंगे,
सोचो, साधु भरत के भी क्या साधन निष्फल जावेंगे?
पच सकती है रश्मिराशि क्या महाग्रास के तम से भी?
आर्य, उगलवा लूँगा अपनी आर्या को मैं यम से भी!
मेट सकेगा कौन विश्व के पातिव्रत की लीक, कहो?
यह अंबर उस अग्नि-शिखा को ढँक न सकेगा, दुखी न हो।’
‘काल-फणी की मणि पर जिसने फैलाया है अपना हाथ,
उसी अभागे का दुख मुझको’-बोले लक्ष्मण से रघुनाथ।
कर जटायु-संस्कार बीच में दोनों ने निज पथ पकड़ा,
आगे किसी कबन्धासुर ने अजगर ज्यों उनको जकड़ा।
मारा बाहु काट वैरी को, बन्धु-सदृश फिर दाह किया,
सदा भाव के भूखे प्रभु ने शवरी का आतिथ्य लिया।
यों ही चल कर पम्पासर का पत्र-पुष्प-अर्पण देखा,
निज कृश-करुण-मूर्त्ति का मानों प्रभु ने वह दर्पण देखा।
आगे ऋष्यमूक पर्वत पर, वानर ही कहिए, हम थे,
विषम प्रकृति वाले होकर भी आकृति में नर के सम थे।
था सुग्रीव हमारा स्वामी, मन के दुःखों का मारा,
कामी अग्रज बली बालि ने हर ली जिसकी धन-दारा।
इस किंकर ने उतर अद्रि से दया-दृष्टि प्रभु की पाई,
सहज सहानुभूति-वश उस पर प्रीति उन्होंने दिखलाई।
लिये जा रहा था रावण-वक जब शफरी-सी सीता को
देखा हमने स्वयं तड़पते उन पद्मिनी पुनीता को।

हिम-सम अश्रु और मोती का हार उन्होंने, हमें निहार,
उझल दिया मानों झोंके से,-देकर निज परिचय दो बार।
अश्रु-बिन्दु तो पिरो ले गईं किरणें स्वर्णाभरण विचार,
उनका स्मारक छिन्न हार ही हुआ वहाँ प्रभु का उपहार।
कह सुकण्ठ को बन्धु उन्होंने किया कृतार्थ अंक भर भेट,
बर्बर पशु कह एक बाण से किया बालि का फिर आखेट।
इसके पहले ही विभु-बल का था हमको मिल चुका प्रमाण,
फोड़ गया था सात ताल-तरु वहाँ एक ही उनका बाण।

वर्षा-काल बिताया प्रभु ने उसी शैल पर शंकर-रूप,
हुआ सती सीता के मुख-सा शरच्चन्द्र का उदय अनूप।
भूला पाकर किष्किन्धा का राज्य और दारा सुग्रीव,
स्वयं ब्रह्म ही मायामय है, कितना-सा है जन का जीव?
भूल मित्र का दुःख शत्रु-सा सुख भोगे, वह कैसा मित्र?
पहुँचे पुर में प्रकुपित होकर धन्वी लक्ष्मण चारु-चरित्र।
तारा को आगे करके तब नत वानरपति शरण गया,
देख दीन अबला को सम्मुख आवेगी किसको न दया?
गये सहस्र सहस्र कीश तब करने को देवी की खोज,
दी मुद्रिका मुझे प्रभुवर ने, फेरा मुझ पर स्वकर-सरोज।
दुस्तर क्या है उसे विश्व में प्राप्त जिसे प्रभु का प्रणिधान?
पार किया मकरालय मैं ने उसे एक गोष्पद-सा मान।
देख एक दो विघ्न बीच में हुआ मुझे उलटा विश्वास-
बाधाओं के भीतर ही तो कार्य-सिद्धि करती है वास।
निरख शत्रु की स्वर्णपुरी वह मुझे दिशा-सी भूली थी,
नील जलधि में लंका थी या नभ में सन्ध्या फूली थी!
भौतिक-विभूतियों की निधि-सी, छवि की छत्रच्छाया-सी,
यन्त्रों-मन्त्रों-तन्त्रों की थी वह त्रिकूटिनी माया-सी!
उस भव-वैभव की विरक्ति-सी वैदेही व्याकुल मन में,
भिन्न देश की खिन्न लता-सी पहँचानी अशोक-वन में।
क्षण क्षण में भय खाती थीं वे, कण कण आँसू पीती थीं,
आशा की मारी देवी उस दस्यु-देश में जीती थीं।
थी उस समय रात, मैं छिप कर अश्रु पोंछ था देख रहा,
आकर काल-रूप रावण ने उन मुमूर्षु के निकट कहा-
‘कहा मान अब भी हे मानिनि, बन इस लंका की रानी,
कहाँ तुच्छ वहा राम? कहाँ मैं विश्वजयी रावण मानी?’
‘जीत न सका एक अबला का मन तू विश्वजयी कैसा?
जिन्हें तुच्छ कहता है, उनसे भागा क्यों, तस्कर, ऐसा?
मैं वह सीता हूँ, सुन रावण, जिसका खुला स्वयंवर था,
वर लाया क्यों मुझे न पामर, यदि यथार्थ ही तू नर था?
वर न सका कापुरुष, जिसे तू, उसे व्यर्थ ही हर लाया,
अरे अभागे, इस ज्वाला को क्यों तू अपने घर लाया?
भाषण करने में भी तुझसे लग न जाय हा! मुझको पाप,
शुद्ध करुँगी मैं इस तनु को अग्नि-ताप में अपने आप।’
विमुख हुईं मौनव्रत लेकर उस खल के प्रति पतिव्रता,
एक मास की अवधि और दे गया पतित, वे रहीं हता।
जाकर तब देवी के सम्मुख मैं ने उन्हें प्रणाम किया,
प्रभु की नाम-मुद्रिका देकर परिचय, प्रत्यय, धैर्य दिया।
‘करें न मेरे पीछे स्वामी विषम कष्ट-साहस के काम,
यही दुःखिनी सीता का सुख-सुखी रहें उसके प्रिय-राम।
मेरे धन वे घनश्याम ही, जानेगा यह अरि भी अन्ध,
इसी जन्म के लिए नहीं है राम-जानकी का सम्बन्ध।
देवर से कहना-मैं ने जो मानी नहीं तुम्हारी बात,
उसी दोष का दण्ड मिला यह, क्षमा करो मुझको अब तात!’
मैंने कहा-अम्ब, कहिए तो अभी आपको ले जाऊँ,
बोली वे-‘क्या चोरी चोरी मैं अपने प्रभु को पाऊँ?’
माँग अनुज्ञा मैंने उनसे उस उपवन के फल खाये,
और उजाड़ा उसे प्रकृति-वश, मारे जो रक्षक आये।
आया तब कुछ सैनिक लेकर एक पुत्र रावण का अक्ष,
विटपों से भट मार, शत्रु का तोड़ दिया घूँसों से वक्ष।
नागपाश में, विदित इन्द्रजित बाँध ले गया मुझे अहा!
‘जीता हुआ जला दो इसको’-रावण ने सक्रोध कहा।
लंका में भी साधु विभीषण था रावण का ही भाई,
लेता रहा पक्ष प्रभु का, पर, सुनता है कब अन्यायी।
तब लपेट तैलाक्त पटच्चर आग लगाई रिपुओं ने,
पर निज पुरी उसी पावक में जलती पाई रिपुओं ने।
जली पाप की लंका जिससे, वह थी एक सती की हूक;
मैं ने तो झटपट समुद्र में कूद बुझा ली अपनी लूक।
देवी ने चूड़ामणि दी थी, मैं ने प्रभु को दी लाकर,
तुष्ट हुए वे सुध पाकर यों मानों उनको ही पाकर।

तब लंका पर हुई चढ़ाई, सजी ऋक्ष-वानर-सेना,
मिल मानों दो सलिल-राशियाँ उमड़ीं फैला कर फेना।
भंग-भित्तियाँ उठा उठा कर सिन्धु रोकने चला प्रवाह,
बाँधा गया किन्तु उलटा वह, सेतु रूप ही है उत्साह।
नीलनभोमण्डल-सा जलनिधि, पुल था छायापथ-सा ठीक,
खींच दी गई एक अमिट-सी पानी पर भी प्रभु की लीक!

उधर विभीषण ने रावण को पुनः प्रेम-वश समझाया,
पर उस साधु पुरुष ने उलटा देशद्रोही पद पाया!
‘तात, देश की रक्षा का ही कहता हूँ मैं उचित उपाय,
पर वह मेरा देश नहीं जो करे दूसरों पर अन्याय।
किसी एक सीमा में बँध कर रह सकते हैं क्या ये प्राण?
एक देश क्या, अखिल विश्व का तात, चाहता हूँ मैं त्राण।
वार धर्म पर राज्य जिन्होंने वन का दारुण दुख भोगा,
वे यदि मेरे वैरी होंगे, तो फिर बन्धु कौन होगा?
शत्रु नहीं, शासक वे सबके, आप न इस मद में भूलें,
गुरुतम गज भी सह सकता है क्या लघु अंकुश की हूलें?
परनारी, फिर सती और वह त्याग-मूर्त्ति सीता-सी सृष्टि,
जिसे मानता हूँ मैं माता, आप उसी पर करें कुदृष्टि!
उड़ जावेगा दग्ध देश का सती-श्वास से ही बल-वित्त,
राम और लक्ष्मण तो होंगे कहने भर के लिए निमित्त।’
उपचारक पर रुक्ष रुग्ण-सा रावण उलटा क्षुब्ध हुआ-
‘निकल यहाँ से, शत्रु-शरण जा, जिसके गुण पर लुब्ध हुआ।’
‘जैसी आज्ञा,’ उठा विभीषण, यह कह उसने किया प्रयाण-
‘जँचा इसी में तात; मुझे भी निज पुलस्त्य-कुल का कल्याण।’
वैरी का भाई था, फिर भी प्रभु ने बन्धु-समान लिया,
उसको शरणागत विलोक कर हित से समुचित मान दिया।
कहा मन्त्रियों ने कुछ, तब वे बोले-‘दुर्बल हैं हम क्या?
छले धर्म ही हमें हमारा, तो है भला यही कम क्या?’

प्रभु ने दूत भेज रावण को दिया और भी अवसर एक,
हित में अहित, अहित ही में हित, किन्तु मानता है अविवेक।
सर्वनाशिनी बर्बरता भी पाती है विग्रह में नाम,
पड़ा योग्य ही रक्षों को हम ऋक्ष-वानरों से अब काम।
आयुध तो अतिरिक्त समझिए, अस्त्र आप हैं अपने अंग,
दन्त, मुष्टियाँ, नख, कर, पद सब चलने लगे संग ही संग।
मार मार हुंकार साथ ही निज निज प्रभु का जय जयकार,
बहते विटप, डूबते प्रस्तर, बुझते शोणित में अंगार।
निज आहार जिन्हें कहते थे, राक्षस अपने मद में भूल,
हुए अजीर्ण वही हम उनके मारक गुल्म, विदारक शूल।
रण तो राम और रावण का, पण परन्तु है लक्ष्मण का,
शौर्य-वीर्य दोनों के ऊपर साहस उन्हीं सुलक्षण का।
लड़ना छोड़ छोड़ कर बहुधा देखा मैंने उनका युद्ध,
निकले-घुसे घनों में रवि ज्यों, रह न सके क्षण भर भी रुद्ध।
शेल-शूल, असि-परशु, गदा-घन, तोमर-भिन्दिपाल, शर-चक्र,
शोणित बहा रही हैं रण में विविध सार-धाराएँ वक्र।
‘आ रे, आ, जा रे, जा!’ कह कह भिड़ते हैं जन जन के साथ,
घन घन, झन झन, सन सन निस्वन होता है हन हन के साथ!
नीचे स्यार पुकार रहे हैं, ऊपर मड़राते हैं गिद्ध,
सोने की लंका मिट्टी में मिलती है लोहे से बिद्ध।
भेद नहीं पाते हैं रविकर दिया शून्य को रज ने पाट,
पर अमोघ प्रभु के शर खर तर जाते हैं अरिकुल को काट।
अपने जिन अगणित वीरों पर गर्वित था वह राक्षसराज,
एक एक करके भी मर कर हुए नगण्य अहो वे आज।
दाँत पीस कर, ओंठ काट कर, करता है वह क्रुद्ध प्रहार,
पर हँस हँस कर ही प्रभु सबका करते हैं पल में प्रतिकार।
देखा आह! आज ही मैंने उन्हें क्रोध करते कुछ काल,
काँप उठे भय से हम सब भी कहूँ शत्रुओं का क्या हाल?
कुपित इन्द्रजित ने, क्रम क्रम से सबको देख काल की भेट,
छोड़ी लक्ष्मण पर लंका की मानों सारी शक्ति समेट।
विधि ने उसे अमोघ किया था, पर न हटे रामानुज धीर;
इसी दास ने दौड़ उठाया हा! उनका निश्चेष्ट शरीर।

धैर्य न छोड़ें आप, शान्त हों, भक्षक से रक्षक बलवान,
उन्हें देख ‘हा लक्ष्मण!’ कह कर सजल हुए प्रभु जलद-समान।
जगी उसी क्षण विद्युज्ज्वाला, गरज उठे होकर वे क्रुद्ध,-
‘आज काल के भी विरुद्ध है युद्ध-युद्ध बस मेरा युद्ध!
रोऊँगा पीछे, होऊँगा उऋण प्रथम रिपु के ऋण से।’
प्रलयानल-से बढ़े महाप्रभु, जलने लगे शत्रु तृण-से।
एक असह्य प्रकाश-पिण्ड था, छिपी तेज में आकृति में आप;
बना चाप ही रविमण्डल-सा उगल उगल शर-किरण-कलाप।
कोप-कटाक्ष छोड़ता हो ज्यों भृकुटि चढ़ाकर काल कराल;
क्षण भर में ही छिन्न-भिन्न-सा हुआ शत्रु-सेना का जाल।
क्षुब्ध नक्र जैसे पानी में, पर्वत में जैसे विस्फोट,
अरि-समूह में विभु वैसे ही करते थे चोटों पर चोट।
कर-पद रुण्ड-मुण्ड ही रण में उड़ते, गिरते, पड़ते थे,
कल कल नहीं, किन्तु भल भल कर रक्तस्रोत उमड़ते थे।
रिपुओं की पुकार भी मानों निष्फल जाती बारंबार,
गूँज उसे भी दबा रही थी उनके धन्वा की टंकार।
निज निर्घोषों से भी आगे जाते थे उनके आघात;
मानों उस राक्षस-युगान्त में प्रलय-पयोदों के पवि-पात!
सर्वनाश-सा देख सामने रावण को भी कोप हुआ,
पर पल भर में प्रभु के आगे सारा छल-बल लोप हुआ।
‘बच रावण, निज वत्स-मरण तक, बन न राम-बाणों का लक्ष,
मेरे वत्स-शोक का साक्षी बने यहाँ तेरा ही वक्ष।
कहाँ इन्द्रजित? किन्तु न होऊँ मैं लक्ष्मण का अपराधी,
जिसने आज यहाँ पर उसकी वध-साधन-समाधि साधी।
राक्षस, तेरे तुच्छ बाण क्या? मेरे इस उर में है शैल;
उसे झेलने के पहले तू मेरा एक विशिख ही झेल।’
अश्व, सारथी और शत्रुभुज एक बाण ने वेध दिया,
मूर्च्छित छोड़ उन्होंने उसको अगणित अरि-पशु-मेध किया।
आँधी में उड़ते पत्तों से, दलित हुए सब सेनानी;
पर उस मेघनाद के बदले आया कुम्भकर्ण मानी।
‘भाई का बदला भाई ही!’ गरज उठे वे घन-गम्भीर,
गज पर पंचानन-सम उस पर टूट पड़े उसका दल चीर।
‘अनुमोदक तो नहीं किन्तु निज अग्रज का अनुगत हूँ मैं,
निद्रा और कलह दो में ही राघव, सन्तत रत हूँ मैं।
वज्रदन्त, घूम्राक्ष नहीं मैं, नहीं अकम्पन और प्रहस्त,
राम, सूर्य-सम होकर भी तुम समझो मुझको अपना अस्त!’
‘निद्रा और कलह का, निशिचर, तू बखान कर रहा सगर्व,
जाग, सुलाऊँ तुझे सदा को, मेटूँ कला-कामना सर्व।’
उस उत्पाती घन ने अपने उपल-वज्र बहु बरसाये,
किन्तु प्रभंजन-बल से प्रभु के उड़ीं घज्जियाँ, शर छाये।
गिरा हमारे दल पर गिरि-सा मरते मरते भी वह घोर,
छोड़ धनुःशर बोले प्रभु भी कर युग कर रावण की ओर-
‘आ भाई, वह वैर भूल कर, हम दोनों समदुःखी मित्र,
आ जा, क्षण भर भेंट परस्पर, करलें अपने नेत्र पवित्र!’
हाय! किन्तु इसके पहले ही मूर्च्छित हुआ निशाचर-राज,
प्रभु भी यह कह गिरे-‘राम से रावण ही सहृदय है आज!’
सन्ध्या की उस धूसरता में उमड़ा करुणा का उद्रेक,
छलक छलक कर झलके ऊपर नभ के भी आँसू दो एक।
हम सब हाथों पर सँभाल कर उन्हें शिविर में ले आये,
देख अनुज की दशा दयामय,दुगुने आँसू भर लाये।
‘सर्व कामना मुझे भेंट कर वत्स, कीर्त्ति-कामी न बनो,
रहे सदा तुम तो अनुगामी, आज अग्रगामी न बनो!’
समझाया वैद्यों ने उनको-‘आर्य, अधीर न हों इस भाँति,
अब भी आशा, वही करें बस सफल हो सके वह जिस भाँति।’
‘तुच्छ रक्त क्या, इस शरीर में डालो कोई मेरे प्राण,
गत सुन कर भी मुझे जानकी पावेगी दुःखों से त्राण।’
बोल उठे सब-‘प्रस्तुत हैं ये प्राण, इन्हें लक्ष्मण पावें,
डूब जायँ हम सौ सौ तारे, चन्द्र हमारे बच जावें।
‘संजीवनी मात्र ही स्वामी, आ जावे यदि रातों रात,
तो भी बच सकते हैं लक्ष्मण, बन सकती है बिगड़ी बात।
पंजर भग्न हुआ, पर पक्षी अब भी अटक रहा है आर्य!’
आगे बढ़ बोला मैं-‘प्रभुवर, किंकर कर लेगा यह कार्य।’
आया इसीलिए मैं, आहा! हुआ बीच में ही वह काम,
अब आज्ञा दीजे, जाऊँ मैं, चिन्तित होंगे वे गुण-धाम।
मायावी रावण प्रसिद्ध है, किन्तु सत्य-विग्रह श्री राम,
चिन्ता करें न आप चित्त में, निश्चित ही है शुभ परिणाम।”
मारुति ने निज सूक्ष्म गिरा में बीज-तुल्य जो वृत्त दिया,
आते ही इस अश्रु-भूमि में उसने अंकुर-रूप लिया!
चौंक भरत-शत्रुघ्न-माण्डवी मानों यह दुःस्वप्न विलोक,
ओषधि देकर भी कुछ उनसे कह न सके सह कर वह शोक।

खींच कर श्वास आस-पास से प्रयास बिना
सीधा उठ शूर हुआ तिरछा गगन में,
अग्नि-शिखा ऊँची भी नहीं है निराधार कहीं,
वैसा सार-वेग कब पाया सान्ध्य-घन में?
भूपर से ऊपर गया यों वानरेन्द्र मानों
एक नया भद्र भौम जाता था लगन में,
प्रकट सजीव चित्र-सा था शून्य पट पर,
दण्ड-हीन केतन दया के निकेतन में!

लंकानल, शंका-दलन, जय जय पवनकुमार,
तुमने सागर पार कर किया गगन भी पार!

 

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