एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 1

एकांत संगीत (कविता)

तट पर है तरुवर एकाकी,
नौका है, सागर में,
अंतरिक्ष में खग एकाकी,
तारा है, अंबर में,

भू पर वन, वारिधि पर बेड़े,
नभ में उडु खग मेला,
नर नारी से भरे जगत में
कवि का हृदय अकेला!

अब मत मेरा निर्माण करो

अब मत मेरा निर्माण करो!

तुमने न बना मुझको पाया,
युग-युग बीते, मैं न घबराया;
भूलो मेरी विह्वलता को, निज लज्जा का तो ध्यान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

इस चक्की पर खाते चक्कर
मेरा तन-मन-जीवन जर्जर,
हे कुंभकार, मेरी मिट्टी को और न अब हैरान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

कहने की सीमा होती है,
सहने की सीमा होती है;
कुछ मेरे भी वश में, मेरा कुछ सोच-समझ अपमान करो!
अब मत मेरा निर्माण करो!

 मेरे उर पर पत्थर धर दो

मेरे उर पर पत्थर धर दो!

जीवन की नौका का प्रिय धन
लुटा हुआ मणि-मुक्ता-कंचन
तो न मिलेगा, किसी वस्तु से इन खाली जगहों को भर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

मंद पवन के मंद झकोरे,
लघु-लघु लहरों के हलकोरे
आज मुझे विचलित करते हैं, हल्का हूँ, कुछ भारी कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

पर क्यों मुझको व्यर्थ चलाओ?
पर क्यों मुझको व्यर्थ बहाओ?
क्यों मुझसे यह भार ढुलाओ? क्यों न मुझे जल में लय कर दो!
मेरे उर पर पत्थर धर दो!

मूल्य दे सुख के क्षणों का

मूल्य दे सुख के क्षणों का!
एक पल स्वच्छंद होकर
तू चला जल, थल, गगन पर,
हाय! आवाहन वही था विश्व के चिर बंधनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!

पा निशा की स्वप्न छाया
एक तूने गीत गाया,
हाय! तूने रुद्ध खोला द्वार शत-शत क्रंदनों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!

आँसुओं से ब्याज भरते
अनवरत लोचन सिहरते,
हाय! कितना बढ़ गया ॠण होंठ के दो मधुकणों का!
मूल्य दे सुख के क्षणों का!

कोई गाता, मैं सो जाता

कोई गाता, मैं सो जाता!

संसृति के विस्तृत सागर पर
सपनों की नौका के अंदर
सुख-दुख की लहरों पर उठ-गिर बहता जाता मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!

आँखों में भरकर प्यार अमर,
आशीष हथेली में भरकर
कोई मेरा सिर गोदी में रख सहलाता, मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!

मेरे जीवन का खारा जल,
मेरे जीवन का हालाहल
कोई अपने स्वर में मधुमय कर बरसाता, मैं सो जाता!
कोई गाता मैं सो जाता!

मेरा तन भूखा, मन भूखा

मेरा तन भूखा, मन भूखा!

इच्छा, सब सत्यों का दर्शन,
सपने भी छोड़ गये लोचन!
मेरे अपलक युग नयनों में मेरा चंचल यौवन भूखा!
मेरा तन भूखा, मन भूखा!

इच्छा, सब जग का आलिंगन,
रूठा मुझसे जग का कण-कण!
मेरी फैली युग बाहों में मेरा सारा जीवन भूखा!
मेरा तन भूखा, मन भूखा!

आँखें खोले अगणित उडुगण,
फैला है सीमाहीन गगन!
मानव की अमिट विभुक्षा में क्या अग-जग का कारण भूखा?
मेरा तन भूखा, मन भूखा!

व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा

व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?

प्यासी आँखें, भूखी बाँहें,
अंग-अंग की अगणित चाहें;
और काल के गाल समाता जाता है प्रति क्षण तन मेरा!
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?

आशाओं का बाग लगा है,
कलि-कुसुमों का भाग जगा है;
पीले पत्तों-सा मुर्झाया जाता है प्रति पल मन मेरा!
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?

क्या न किसी के मन को भाया,
दिल न किसी का बहला पाया?
क्या मेरे उर के अंदर ही गूँज मिटा उर क्रंदन मेरा?
व्यर्थ गया क्या जीवन मेरा?

 खिड़की से झाँक रहे तारे

खिड़की से झाँक रहे तारे!

जलता है कोई दीप नहीं,
कोई भी आज समीप नहीं,
लेटा हूँ कमरे के अंदर बिस्तर पर अपना मन मारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

सुख का ताना, दुख का बाना,
सुधियों ने है बुनना ठाना,
लो, कफ़न ओढाता आता है कोई मेरे तन पर सारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

अपने पर मैं ही रोता हूँ,
मैं अपनी चिता संजोता हूँ,
जल जाऊँगा अपने कर से रख अपने ऊपर अंगारे!
खिड़की से झाँक रहे तारे!

नभ में दूर-दूर तारे भी

नभ में दूर-दूर तारे भी!

देते साथ-साथ दिखलाई,
विश्व समझता स्नेह-सगाई;
एकाकी पन का अनुभव, पर, करते हैं ये बेचारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी

उर-ज्वाला को ज्योति बनाते,
निशि-पंथी को राह बताते,
जग की आँख बचा पी लेते ये आँसू खारे भी!
नभ में दूर-दूर तारे भी

अंधकार से मैं घिर जाता,
रोना ही रोना बस भाता
ध्यान मुझे जब जब यह आता-
दूर हृदय से कितने मेरे, मेरे जो सबसे प्यारे भी
नभ में दूर-दूर तारे भी

मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ

मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?

जगती के सागर में गहरे
जो उठ-गिरतीं अगणित लहरें,
उनमें एक लहर लघु मैं भी, क्यों निज चंचलता दिखलाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?

जगती के तरुवर में प्रति पल
जो लगते-गिरते पल्लव-दल,
उनमें एक पात लघु मैं भी, क्यों निज मरमर-गायन गाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?

मुझ-सा ही जग भर का जीवन,
सब में सुख-दुख, रोदन-गायन,
कुछ बतला, कुछ बात छिपा क्यों एक पहेली व्यर्थ बुझाऊँ?
मैं क्यों अपनी बात सुनाऊँ?

छाया पास चली आती है

छाया पास चली आती है!

जड़ बिस्तर पर पड़ा हुआ हूँ,
तम-समाधि में गड़ा हुआ हूँ;
तन चेतनता-हीन हुआ है, साँस महज चलती जाती है!
छाया पास चली आती है!

तन सफ़ेद है, पट सफ़ेद है,
अंग-अंग में भरा भेद है,
निकट खिसकती देख इसे धकधक करती मेरी छाती है!
छाया पास चली आती है!

हाथों में कुछ है प्याला-सा,
प्याले में कुछ है काला-सा,
जान गया क्या मुझे पिलाने यह साकीबाला लाती है!
छाया पास चली आती है!

मध्य निशा में पंछी बोला

मध्य निशा में पंछी बोला!

ध्वनित धरातल और गगन है,
राग नहीं है, यह क्रंदन है,
टूटे प्यारी नींद किसी की, इसने कंठ करुण निज खोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!

निश्चित गाने का अवसर है,
सीमित रोने को निज घर है,
ध्यान मुझे जग का रखना है, धिक मेरा मानव तन चोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!

कितनी रातों को मन मेरा,
चाहा, कर दूँ चीख सबेरा,
पर मैंने अपनी पीड़ा को चुप-चुप अश्रुकणों में घोला!
मध्य निशा में पंछी बोला!

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