एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 5

मैंने मान ली तब हार

मैंने मान ली तब हार!

पूर्ण कर विश्वास जिसपर,
हाथ मैं जिसका पकड़कर,
था चला, जब शत्रु बन बैठा हृदय का गीत,
मैंने मान ली तब हार!

विश्व ने बातें चतुर कर,
चित्त जब उसका लिया हर,
मैं रिझा जिसको न पाया गा सरल मधुगीत,
मैंने मान ली तब हार!

विश्व ने कंचन दिखाकर
कर लिया अधिकार उसपर,
मैं जिसे निज प्राण देकर भी न पाया जीत,
मैंने मान ली तब हार!

देखतीं आकाश आँखें

देखतीं आकाश आँखें!

श्वेत अक्षर पृष्ठ काला,
तारकों की वर्णमाला,
पढ़ रहीं हैं एक जीवन का जटिल इतिहास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!

सत्य यों होगी कहानी,
बात यह समझी न जानी,
खो रही हैं आज अपने आप पर विश्वास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!

छिप गये तारे गगन के,
शून्यता आगे नयन के,
किस प्रलोभन से करातीं नित्य निज उपहास आँखें!
देखतीं आकाश आँखें!

तेरा यह करुण अवसान

तेरा यह करुण अवसान!

जब तपस्या-काल बीता,
पाप हारा, पूण्य जीता,
विजयिनी, सहसा हुई तू, हाय, अंतर्धान!
तेरा यह करुण अवसान!

जब तुझे पहचान पाया,
देवता को जान पाया,
खींच तुझको ले गया तब काल का आह्वान!
तेरा यह करुण अवसान!

जब मिटा भ्रम का अँधेला,
जब जगी वरदान-बेला,
तू अनंत निशीथ-निद्रा में हुई लयमान!
तेरा यह करुण अवसान!

बुलबुल जा रही है आज

बुलबुल जा रही है आज!

प्राण सौरभ से भिदा है,
कंटकों से तन छिदा है,
याद भोगे सुख-दुखों की आ रही है आज!
बुलबुल जा रही है आज!

प्यार मेरा फूल को भी,
प्यार मेरा शूल को भी,
फूल से मैं खुश, नहीं मैं शूल से नाराज!
बुलबुल जा रही है आज!

आ रहा तूफान हर-हर,
अब न जाने यह उड़ाकर,
फेंक देगा किस जगह पर!
तुम रहो खिलते, महकते कलि-प्रसून-समाज!
बुलबुल जा रही है आज!

जब करूँ मैं काम

जब करूँ मैं काम!

प्रेरणा मुझको नियम हो,
जिस घड़ी तक बल न कम हो,
मैं उसे करता रहूँ यदि काम हो अभिराम!
जब करूँ मैं काम!

जब करूँ मैं गान,
हो प्रवाहित राग उर से,
हो तरंगित सुर मधुर से,
गति रहे जब तक न इसका हो सके अवसान!
जब करूँ मैं गान!

जब करूँ मैं प्यार,
हो न मुझपर कुछ नियंत्रण,
कुछ न सीमा, कुछ न बंधन,
तब रुकूँ जब प्राण प्राणों से करे अभिसार!
जब करूँ मैं प्यार!

मिट्टी दीन कितनी, हाय

मिट्टी दीन कितनी, हाय!

हृदय की ज्‍वाला जलाती,
अश्रु की धारा बहाती,
और उर-उच्‍छ्वास में यह काँपती निरुपाय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!

शून्‍यता एकांत मन की,
शून्‍यता जैसे गगन की,
थाह पाती है न इसका मृत्तिका असहाय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!

वह किसे दोषी बताए,
और किसको दुख सुनाए,
जब कि मिट्टी साथ मिट्टी के करे अन्‍याय!
मिट्टी दीन कितनी, हाय!

घुल रहा मन चाँदनी में

घुल रहा मन चाँदनी में!

पूर्णमासी की निशा है,
ज्योति-मज्जित हर दिशा है,
खो रहे हैं आज निज अस्तित्व उडुगण चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!

हूँ कभी मैं गीत गाता,
हूँ कभी आँसू बहाता,
पर नहीं कुछ शांति पाता,
व्यर्थ दोनों आज रोदन और गायन चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!

मौन होकर बैठता जब,
भान-सा होता मुझे तब,
हो रहा अर्पित किसी को आज जीवन चाँदनी में!
घुल रहा मन चाँदनी में!

व्याकुल आज तन-मन-प्राण

व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

तन बदन का स्पर्श भूला,
पुलक भूला, हर्ष भूला,
आज अधरों से अपरिचित हो गई मुस्कान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

मन नहीं मिलता किसी से,
मन नहीं खिलता किसी से,
आज उर-उल्लास का भी हो गया अवसान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण!

आज गाने का न दिन है,
बात करना भी कठिन है,
कंठ-पथ में क्षीण श्वासें हो रहीं लयमान!
व्याकुल आज तन-मन-प्राण

 मैं भूला-भूला-सा जग में

मैं भूला-भूला-सा जग में!

अगणित पंथी हैं इस पथ पर,
है किंतु न परिचित एक नजर,
अचरज है मैं एकाकी हूँ जग के इस भीड़ भरे मग में।
मैं भूला-भूला-सा जग में!

अब भी पथ के कंकड़-पत्थर,
कुश, कंटक, तरुवर, गिरि गह्वर,
यद्यपि युग-युग बीता चलते, नित नूतन-नूतन ड़ग-ड़ग में!
मैं भूला-भूला-सा जग में!

कर में साथी जड़ दण्ड़ अटल,
कंधों पर सुधियों का संबल,
दुख के गीतों से कंठ भरा, छाले, क्षत, क्षार भरे पग में!
मैं भूला-भूला-सा जग में!

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