एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

एकांत-संगीत -हरिवंशराय बच्चन -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harivansh Rai Bachchan Part 2

जा कहाँ रहा है विहग भाग

जा कहाँ रहा है विहग भाग?

कोमल नीड़ों का सुख न मिला,
स्नेहालु दृगों का रुख न मिला,
मुँह-भर बोले, वह मुख न मिला, क्या इसीलिये, वन से विराग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

यह सीमाओं से हीन गगन,
यह शरणस्थल से दीन गगन,
परिणाम समझकर भी तूने क्या आज दिया है विपिन त्याग?
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

दोनों में है क्या उचित काम?
मैं भी लूँ तेरा संग थाम,
या तू मुझसे मिलकर गाए जीवन-अभाव का करुण राग!
जा कहाँ रहा है विहग भाग?

जा रही है यह लहर भी

जा रही है यह लहर भी!

चार दिन उर से लगाया,
साथ में रोई, रुलाया,
पर बदलती जा रही है आज तो इसकी नजर भी!
जा रही है यह लहर भी!

हाय! वह लहरी न आती,
जो सुधा का घूँट लाती,
जो न आकर लौटती फिर, कर मुझे देती अमर भी!
जा रही है यह लहर भी!

वो गई तृष्णा जगाकर,
वह गई पागल बनाकर,
आँसुओं से यह भिगाकर,
क्यों लहर आती नहीं है जो पिला जाती जहर भी!
जा रही है यह लहर भी!

प्रेयसि, याद है वह गीत

प्रेयसि, याद है वह गीत?

गोद में तुझको लेटाकर,
कंठ में उन्मत्त स्वर भर,
गा जिसे मैंने लिया था स्वर्ग का सुख जीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?

है न जाने तू कहाँ पर,
कंठ सूखा, क्षीणतर स्वर,
सुन जिसे मैं आज हो उठता स्वयं भयभीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?

तू न सुनने को रही जब,
राग भी जब वह गया दब,
तब न मेरी जिंदगी के दिन गये क्यों बीत!
प्रेयसि, याद है वह गीत?

कोई नहीं, कोई नहीं

कोई नहीं, कोई नहीं!

यह भूमि है हाला-भरी,
मधुपात्र-मधुबाला-भरी,
ऐसा बुझा जो पा सके मेरे हृदय की प्‍यास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!

सुनता, समझता है गगन,
वन के विहंगों के वचन,
ऐसा समझ जो पा सके मेरे हृदय- उच्‍छ्वास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!

मधुऋतु समीरण चल पड़ा,
वन ले नए पल्‍लव खड़ा,
ऐसा फिरा जो ला सके मेरे लिए विश्‍वास को-
कोई नहीं, कोई नहीं!

किसलिये अंतर भयंकर

किसलिये अंतर भयंकर?

चाहता मैं गान मन का,
राग बन जाता गगन का,
किंतु मेरा स्वर मुझी में लीन हो मिटता निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?

चाहता वह गीत गाना,
सुन जिसे हो खुश जमाना,
किंतु मेरे गीत मुझको ही रुला जाते निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?

चाहता मैं प्यार मेरा,
विश्व का बनता बसेरा,
किंतु अपने आप को ही मैं घृणा करता निरंतर!
किसलिये अंतर भयंकर?

अब तो दुख दें दिवस हमारे

अब तो दुख दें दिवस हमारे!

मेरा भार स्वयं ले करके,
मेरी नाव स्वयं खे करके,
दूर मुझे रखते जो श्रम से, वे तो दूर सिधारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!

रह न गये जो हाथ बटाते,
साथ खेवाकर पार लगाते,
कुछ न सही तो साहस देते होकर खड़े किनारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!

डूब रही है नौका मेरी,
बंद जगत हैं आँखें तेरी,
मेरी संकट की घड़ियों के साखी नभ के तारे!
अब तो दुख दें दिवस हमारे!

मैंने गाकर दुख अपनाए

मैंने गाकर दुख अपनाए!

कभी न मेरे मन को भाया,
जब दुख मेरे ऊपर आया,
मेरा दुख अपने ऊपर ले कोई मुझे बचाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!

कभी न मेरे मन को भाया,
जब-जब मुझको गया रुलाया,
कोई मेरी अश्रु धार में अपने अश्रु मिलाए!
मैंने गाकर दुख अपनाए!

पर न दबा यह इच्छा पाता,
मृत्यु-सेज पर कोई आता,
कहता सिर पर हाथ फिराता-
’ज्ञात मुझे है, दुख जीवन में तुमने बहुत उठाये!
मैंने गाकर दुख अपनाए!

चढ़ न पाया सीढ़ियों पर

चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!

प्रात आया, भक्त आए,
पुष्प-जल की भेंट लाए,
देव-मंदिर पहुँच पाए,
औ’ उन्हें देखा किया मैं लोचनों में नीर भर-भर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!

साँझ आई, भक्त लौटे,
भक्ति से अनुरक्त लौटे,
जान पाए-चाह मेरी वे गए कितनी कुचलकर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!

सब गए जब, रात आई,
पंथ-रज मैंने उठाई,
देवता मेरे मिले मुझको उसी रज से निकलकर!
चढ़ न पाया सीढ़ियों पर!

क्या दंड के मैं योग्य था

क्या दंड के मैं योग्य था!

चलता रहूँ यह चाह दी,
पर एक ही तो राह दी,
किस भाँति होती दूसरी इस देह-यात्रा की कथा!
क्या दंड के मैं योग्य था!

तेरी रजा पर मैं चला,
तब क्या बुरा, तब क्या भला,
फिर भी मुझे मिलती सजा, तेरी निराली है प्रथा!
क्या दंड के मैं योग्य था!

यह दंड तेरे हाथ का
है चिह्न तेरे साथ का
इस दंड से मैं मुक्त हो जाता कभी का, अन्यथा!
क्या दंड के मैं योग्य था?

मैं जीवन में कुछ न कर सका

मैं जीवन में कुछ न कर सका!

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्‍वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्‍याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्‍या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

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