एकांतता का बीज-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

एकांतता का बीज-कविता-प्रफुल्ल सिंह “बेचैन कलम” -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Praful Singh “Bechain Kalam”

 

चित्त में एकांतता का
बीज बोना चाहता हूँ।

तीक्ष्ण सी झंकार झंकृत
कर्ण को करती अलंकृत
पक्ष्म खुल जाते दृगों के,
तदपि सोना चाहता हूँ।

देव! इस विक्षिप्तता में
भावना की रिक्तता में
प्राप्त करके भी स्वयं को,
अद्य खोना चाहता हूँ।

प्रश्न कौतूहल भरा है
कौन संसृति से तरा है?
मैं इसी में एक उत्तर,
को डुबोना चाहता हूँ।

घेर ले चाहे सघन भ्रम
किंतु तोड़ूँगा नहीं क्रम
द्वैत से अद्वैत होकर,
मुक्त होना चाहता हूँ।

[संसार के कोलाहल से विलग स्वयं की
उपस्थिति में एकांतता की अनुभूति
कितनी नैसर्गिक होती है न। स्वयं को
जानने का एक स्वर्णिम अवसर]

 

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