ऋतु-सन्धि-युगधारा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

ऋतु-सन्धि-युगधारा -नागार्जुन-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nagarjun

प्रतीक्षा की
बहुत जोहा बाट
जेठ बीता, हुई वर्षा नहीं, नभ यों ही रहा खल्वाट
आज है आधाढ़ वदि षष्ठी
उठा था जोर का तूफान
उसके बाद
सघन काली घन घटा से
हो रहा आच्छन्न यह आकाश
आज होगी, सजनि, वर्षा-हो रहा विश्वास
हो रही है अवनि पुलकित, ले रही निःश्वास
किंतु अपने देश में तो
सुमुखि, वर्षा हुई होगी एक क्‍या, कै बार
गा रहे होंगे मुदित हो लोग खूब मलार
भर गई होगी अरे वह वाग्मति की धार
उगे होंगे पोखरों में कुमुद पद्म मखान
अँख मूँदे कर रहा मैं ध्यान
लिखूँ क्‍या प्रेयसि, यहाँ का हाल
सामने ही बह रही भगीरथी, बस यही है कल्याण
जिस किसी भी भाँति गर्मी से बचे हैं प्राण
आज-उमड़ी घन घटा को देख
मन यही करता कि मैं भी, प्रियतमे, उसका करूँ आहवान
-कालिदास समान
सामने सरपट पड़ा मैदान _
है न हरियाली किसी भी ओर
तृण -लता-तरुहीन
नग्न प्रांतर देख
उठ रहा सिर में बड़ा ही दर्द
हरा धुँधला या कि नीला-
आ रहा चश्मा न कोई काम
कितु मुझको हो रहा विश्वास
यहाँ भी बादल बरसने जा रहा है आज
अब न सिर में उठेगा फिर दर्द
लग रहा था आज प्रात:काल पानी सर्द
गंगा नहाने वक्त
आया ख्याल
हिमालय में गल रही है बर्फ;
आज होगा ग्रीष्म ऋतु का अंत ।

(1948)

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