ऊँची इमारतें और एक दूसरा शहर देखा -पंकज पुण्डीर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pankaj Pundir

ऊँची इमारतें और एक दूसरा शहर देखा -पंकज पुण्डीर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Pankaj Pundir

 

ऊँची इमारतें और एक दूसरा शहर देखा,
जब भी खिड़की से मैंने अपना शहर देखा,

शिखरों पे फैली है सूरज की मध्यम-लाली,
यूं विषम तलों में छाँव का सर्द कहर देखा,

गुज़रा दौर है आवारगी आज की बात नहीं,
तब पैरों ने कहाँ किस घड़ी का पहर देखा,

लगा हूँ समेटने इस तरह व्यतिथ प्रेम को,
पढ़ा और पी गया जो बातों में ज़हर देखा,

जानना था के कैसे कहाँ पहुँच गया हूँ कब,
उसी शहर की उस गली में जा ठहर देखा,

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