उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा-नज़्में-इब्न-ए-इंशा -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ibn-e-Insha

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा-नज़्में-इब्न-ए-इंशा -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ibn-e-Insha

उस शाम वो रुख़्सत का समाँ याद रहेगा
वो शहर वो कूचा वो मकाँ याद रहेगा

वो टीस कि उभरी थी इधर याद रहेगी
वो दर्द कि उट्ठा था यहाँ याद रहेगा

हम शौक़ के शोले की लपक भूल भी जाएँ
वो शम-ए-फ़सुर्दा का धुआँ याद रहेगा

हाँ बज़्म-ए-शबाना में हमा-शौक़ जो उस दिन
हम थे तिरी जानिब निगराँ याद रहेगा

कुछ ‘मीर’ के अबयात थे कुछ ‘फ़ैज़’ के मिसरे
इक दर्द का था जिन में बयाँ याद रहेगा

आँखों में सुलगती हुई वहशत के जिलौ में
वो हैरत ओ हसरत का जहाँ याद रहेगा

जाँ-बख़्श सी उस बर्ग-ए-गुल-ए-तर की तरावत
वो लम्स-ए-अज़ीज़-ए-दो-जहाँ याद रहेगा

हम भूल सके हैं न तुझे भूल सकेंगे
तू याद रहेगा हमें हाँ याद रहेगा

 

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