उषस् (पाँच)-चैत्या-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta 

उषस् (पाँच)-चैत्या-नरेश मेहता-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Naresh Mehta

 

अश्व की वल्गा लो अब थाम
दिख रहा मानसरोवर कूल!

गौर-कंधों पर ग्रीवा डाल
पूछते हंसों के ये बाल—
स्वर्ग से दिखती है यह झील
हिमालय लगता होगा पाल
तुम्हें वे यश-पत्नियाँ देख, करेंगी गीता सुना अनुकूल!

तराई-वन जब कर लो पार
वहीं हैं नगर, ग्राम औ खेत
कहीं तट की मृदु बाँहें डाल
सो रही होंगी यमुना-रेत
साँझ हम गंगाजल से किरन-कलश फिर भर देंगे इस कूल!

कहीं शिप्रा में श्रद्धा एक
अर्घ्य दे, गुनती होगी श्लोक
रंगमय कर लहरों को देवि
माँग भर देना, रथ को रोक
गगन का श्रेष्ठ खड़ा है नील, बाँह में लिए भोर का फूल!

पुष्ट चिट्टे वृषभों को देख
लगेगा दिन बन आया बैल
चीर भूमा का उर-आँधार
उगे सीता में जीवन-बेल
पुष्पवती पृथ्वी को देना घाम, हँसे अंचल के चावल-फूल!

 

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