उर्वशी काव्य की समाप्ति-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

उर्वशी काव्य की समाप्ति-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

(उर्वशी काव्य के पूर्ण होने पर पंत जी
को लिखा गया एक पत्र)

मान्यवर ! आप कवि की जय हो,
यह नया वर्ष मंगलमय हो।

अब एक नया संवाद सुनें,
दे मुझ को आर्शीवाद, सुनें।

हो गया पूर्ण उर्वशी-काव्य,
जो था वर्षों से असंभाव्य।

उपकार रोग भयकारी का,
यह रहा दान बीमारी का।

पर, खूब तपस्या कड़ी हुई,
बाधा कट-कट फिर खड़ी हुई।

मन को समेट सौ बार थका,
पर केंद्रमग्न वह हो न सका।

जितनी भी की चिंता गहरी,
सूचिका नहीं ध्रुव पर ठहरी।

बरबस जब लिखने लगा छन्द,
देखा समाधि का द्वार बन्द ।

मिन्नतें बहुत कीं माया की,
युवती पुरूरवा-जाया की ।

पर, वह अजीब जिद्दी निकली,
अपनी शरारतों से न टली ।

बैठ ही गई लेकर यह प्रण,
पट का न करूंगी उन्मोचन ।

पर, मैं किवाड़ कूटता रहा,
पूरे बल से टूटता रहा ।

जब जोर लगा उसको खोला,
तन भर का स्नायु-भुवन डोला ।

मन उड़ा, किन्तु, धंस पड़ी, देह;
कुछ रक्तचाप, कुछ मधु-प्रमेह ।

गिर गया कई दिन सुध खो कर
चौखट पर ही मूर्छित्त हो कर ।

रोकते रहे वैद्यधिराज,
पर, मन में था जग चुका बाज ।

मुंह कभी नहीं मोड़ा उसने,
उड्डयन नहीं छोड़ा उसने ।

फिर मैं भावों से भरा हुआ,
जैसे-तैसे उठ खड़ा हुआ ।

बोला, सुन, मोहमयी ललने!
सब की माया, सब की छलने !

यह नहीं सामने कालिदास,
रस-कला-केलि-कविता-विलास ।

कोमल-कर कान्त रवीन्द्र नहीं,
साधक योगी अरविंद नहीं ।

वैसे तो जन अविरोधी हूँ,
फिर भी, स्वभाव से क्रोधी हूँ।

पहचान कला-जग के पवि को,
खुरदुरे करोंवाले कवि को।

मत भाग-दौड़ कर क्रोध जगा,
सीधे चलकर आ गले लगा ।

अपना शिरीष-सा गात देख,
फिर फटे-चिटे ये हाथ देख ।

जो पास नहीं खुद आएगी,
तो वृथा देह नुचवाएगी।

तब महाराज ! वह मान गई,
यह भी पीछे पहचान गई,

मैं ही पुरूस्वा राजा था,
हां, तब अब से कुछ ताजा था।

था उसे खिलाता केवल घृत,
खुद मैं पीता था सोम-अमृत ।

उन दिनों रोग से खाली था,
मैं बड़ा पुष्ट, बलशाली था।

उर्वशी याद करके वह सुख,
हंस पड़ी, सामने करके मुख ।

जब त्रिया करे ऐसा, तब नर
चूमेगा कैसे नहीं अधर?

उर्वशी कंठ से झूल गई,
जो था गुस्सा, सब भूल गई ।

फिर क्या था ? सब खुल गए भेद,
हो उठा विभासित कामदेव ।

मैं घोर चिंतना में धंस कर
पहुंचा भाषा के उस तट पर
था जहाँ काव्य यह धरा हुआ,
सब लिखा-लिखाया पड़ा हुआ ।

बस झेल गहन गोते का सुख
ले आया इसे जगत सम्मुख ।

तब भी, सुकोमल परी भली,
जैसे-तैसे, बच ही निकली।

युग-धर्म देख मुँह मोड़ लिया,
बस, तनिक दबा कर, छोड़ दिया ।

आखिर, कवि ही हूं, नहीं वधिक;
दो-चार नखक्षत से न अधिक ।

पढ़ कर प्रेमी चकराएंगे,
सीधे यह समझ ना पाएँगे,
मैं पुरुरवा हूं या कि च्यवन,
अथवा मेरा नवयुग का मन
सहचर है परी वदान्या का
या औशीनरी-सुकन्या का ?

जो अधिक रसिक होंगे, वे तो
इससे मी खिन्न उठेंगे रो,
जो त्रिया अन्त में आती है,
वह क्यों सब पर छा जाती है ?
क्यों नीति काम को मार गई,
अप्सरा सती से हार गई ?

पर, मैं क्या करूं? सती नारी
आती जब लिए प्रभा सारी,
करतब वह यही दिखाती है,
सब के ऊपर छा जाती है ।

मैं महा दर्शनाचार्य नहीं,
कविता का भी आचार्य नहीं ।

केवल जो समझा, सीखा है,
जो कुछ नयनों को दीखा है,
लिख दिया उसे निश्चल हो कर,
सच है, कुछ लाज-शरम खोकर ।

कहने भर को प्राचीन कथा,
पर इस कविता की मर्म-व्यथा

आज के विलोल हृदय की है,
सबकी सब इसी समय की है ।

जब भी अतीत में जाता हूं,
मुरदों को नहीं जिलाता हूं।

पीछे हटकर फेंकता बाण,
जिससे कम्पित हो वर्तमान ।

खंडहर हो, हो भग्नावशेष,
पर, कहीं बचा हो स्नेह शेष,
तो जा उसको ले आता हूं,
निज युग का दिया जलाता हूं ।

अच्छा, अब इतना आज अलम्,
अब मांग रही आराम कलम ।

दो बजे; बन्द अब काम करूं,
जब तक निश है, विश्राम करूं ।
पहले ले किन्तु बुझा ‘हीटर’
तब सोए कविता का ‘फीटर’ ।

जानें, निद्रा कब आएगी?
या आज रात कट जाएगी
यों ही टटोलते मन अपना,
देखते उर्वशी का सपना?

लेकिन, प्रणाम अब हे कविवर !
सोने को चला अनुज दिनकर ।

(नई दिल्ली, 2 जनवरी, 1961 ई.)

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