उपलब्धि-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

उपलब्धि-अंतर्यात्रा-परंतप मिश्र-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Parantap Mishra

 

पहाड़ों में रहना,
थोड़ा दुष्कर हुआ करता है,
पर रचनात्मक,
प्रकृति की नैसर्गिकता से सज्ज,
पृथ्वी का वरदान ।
नवयौवना के यौवन सा सुरभित,
तरुणी की अंगड़ाई सी अलसाई,
कपोल-किसलय की अरुणाई,

मन्द पवन प्रवाहित सुखदायी,
झरनों से बहता मादक संगीत,
पक्षियों के कोकिलकंठ से प्रणय गीत,
जीवन को रोमांच से भर देता है ।
प्रकृति के गोद में पलते,
जीवों का मनोहारी आकर्षण,
वनस्पतियों का स्नेह निमंत्रण,
वनसम्पदा का रमणीय आमन्त्रण,
मौन की अभिव्यक्ति में,
जीवन की पूर्णता का संदेश है ।
कभी किसी पहाड़ ने मुझसे पुछा था,
“क्या खोजते फिरते हो मुझमें,
मेरे मित्र ! कुछ पाया है अबतक ?”
मैंने कहा, “खोजता तो कुछ भी नहीं,
और कुछ खोजना भी नहीं चाहता हूँ,
पर पाया बहुत कुछ है ।
शायद शब्दों की सीमा में,
अभिव्यक्ति संभव न हो सकेगी ।
तुम्हारे चट्टानों से झाँकते
अनमोल मूर्तियों की धूल को,
साफ कर निहारा है उनका सौन्दर्य,
हर एक पत्थर के,
ह्रदय स्पन्दन को,
महसूस किया है ।
सच कहूँ तो मेरे मित्र !
स्वयं को खोकर,
तुमको पाया है ।
यह मेरी उपलब्धि है ।”

 

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