उपजन का अंग-साखी(दोहे)-संत दादू दयाल जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sant Dadu Dayal Ji

उपजन का अंग-साखी(दोहे)-संत दादू दयाल जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sant Dadu Dayal Ji

दादू नमो नमो निरंजनं, नमस्कार गुरु देवत:।
वन्दनं सर्व साधावा, प्रणामं पारंगत:।1।
दादू माया का गुण बल करे, आपा उपजे आइ।
राजस तामस सात्विकी, मन चंचल ह्नै जाय।2।
आपा नाहीं बल मिटे, त्रिविधा तिमिर नहिं होय।
दादू यहु गुण ब्रह्म का, शून्य समाना सोय।3।
दादु अनुभव उपजी गुण मयी, गुण ही पै ले जाय।
गण हीं सौं गह बंधिया, छूटे कौण उपाय।4।
द्वै पख उपजी परिहरे, निर्पख अनुभव सार।
एक राम दूजा नहीं, दादू लेहु विचार।5।
दादू काया व्यावर गुणमयी, मन मुख उपजे ज्ञान।
चौरासी लख जीव को, इस माया का धयान।6।
आत्म उपज अकाश की, सुण धारती की बाट।
दादू मारग गैब का, कोई लखे न घाट।7।
आत्म बोधी अनुभवी, साधु निर्पख होय।
दादू राता राम सौं, रस पीवेगा सोय।8।
प्रेम भक्ति जब ऊपजे, निश्चल सहज समाधि।
दादू पीवे राम रस, सद्गुरु के परसाद।9।
प्रेम भक्ति जब ऊपजे, पंगुल ज्ञान विचार।
दादू हरि रस पाइए, छूटे सकल विकार।10।

दादू बंझ बियाई आतमा, उपज्या आनँद भाव।
सहज शील संतोष सत, प्रेम मगन मन राव।11।
जब हम ऊजड़ चालते, तब कहते मारग माँहिं।
दादू पहुँचे पंथ चल, कहैं यहु मारग नाँहिं।12।
पहले हम सब कुछ किया, भरम-करम संसार।
दादू अनुभव ऊपजी, राते सिरजनहार।13।
सोइ अनुभव सोइ ऊपजी, सोइ शब्द तत सार।
सुनतां ही साहिब मिले, मन के जाँहि विकार।14।
पारब्रह्म कह्या प्राण सौं, प्राण कह्या घट सोइ।
दादू घट सब सौं कह्या, विष अमृत गुण दोइ।15।
दादू मालिक कह्या अरवाह सौं, अरवाह कह्या औजूद।
औजूद आलम सौं कह्या, हुकम खबर मौजूद।16।
दादू जैसा ब्रह्म है, तैसी अनुभव उपजी होय।
जैसा है तैसा कहै, दादू बिरला कोय।17।
।इति उपजन का अंग सम्पूर्ण।

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