उनका जिस्म जैसे कोई कांच का बुत हो- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

उनका जिस्म जैसे कोई कांच का बुत हो- शायरी-कृष्ण बेताब -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Krishan Betab

उनका जिस्म जैसे कोई कांच का बुत हो
जाने कौन से सांचे में वह ढाले हैं

याद आई कभी उनकी ज़ुल्फ़ों की रमक
गोया नाग सपेरन ने सयाह पाले हैं

कभी आओ तुम तो मैं तुमको दिखला दूं
मैंने किस शौक से ये ग़म पाले हैं

कशीद कर ख़ूं रग-रग से तेरे लिए
अश्कों के भर भर के जाम निकाले हैं

चलो तुम न सही लिपटे मेरी गर्दन से
मेरे गले में उफ़कार के तो हाले हैं

ये छलनी करते हैं दिन रात जिहन को
फिर भी मरता ही नहीं कैसे ये भाले हैं

जहां पड़ते हैं कदम मेरे सनम के
वह मेरे मन्दिर हैं मेरे शिवाले हैं

इतनी की है मैंने इबादत फिर भी
दूर अब तक मुझसे मेरे उजाले हैं

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