उद्बोधन-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

उद्बोधन-भारत-भारती (भविष्यत् खण्ड) -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Bharat-Bharti( Bhavishyat Khand)

उद्बोधन

हतभाग्य हिन्द-जाति ! तेरा पर्व-दर्शन है कहाँ ?
वह शील, शुद्धाचार, वैभव देख, अब क्या है यहाँ ?
क्या जान पड़ती वह कथा अब स्वप्न की-सी है नहीं ?
हम हों वहीं, पर पूर्व-दर्शन दृष्टि आते हैं कहीं? ॥१॥

बीती अनेक शताब्दियाँ पर हाय ! तू जागी नहीं;
यह कुम्भकर्णी नींद तूने तनिक भी त्यागी नहीं !
देखें कहीं पूर्वज हमारे स्वर्ग से आकर हमें-
आँसू बहावें शोक से, इस वेश में पाकर हमें !! ॥ २ ॥

अब भी समय है जागने का देख आँखें खोल के,
सब जग जगाता है तुझे, जगकर स्वयं जय बोल के।
निःशक्त यद्यपि हो चुकी है किन्तु तू न मरी अभी,
अब भी पुनर्जीवन-प्रदायक साज हैं सम्मुख सभी ॥ ३ ॥

हम कौन थे, क्या हो गए हैं, जान लो इसका पता,
जो थे कभी गुरु, है न उनमें शिष्य की भी योग्यता !
जो थे सभी से अग्रगामी, आज पीछे भी नहीं,
है दीखती संसार में विपरीतता ऐसी कहीं? ॥ ४ ॥

दुर्दैव-पीड़ित जो पुराने चिह्न कुछ कुछ रह गए,
देखो, न जाने भाव कितने व्यक्त करते हैं नए।
हा ! क्या कहें आरम्भ ही में रुंध रहा है जब गला,
भगवान् ! क्या से क्या हुए हम, कुछ ठिकाना है भला ! ॥ ५ ॥

कुछ काल में ये जीर्ण पहले चिह्न भी मिट जायँगे,
फिर खोजने से भी न हम सब मार्ग अपना पायेंगे।
जातीय जीवन-दीप अब भी स्नेह पायगा नहीं,
तो फिर अँधेरे में हमें कुछ हाथ आवेगा नहीं ॥६॥

अब भी सुधारेंगे न हम दुर्दैव-वश अपनी दशा,
तो नाम-शेष हमें करेगा काल ले कर्कश कशा !
बस टिमटिमाता दीख पड़ता आज जीवन-दीप है,
हा दैव ! क्या रक्षा न होगी, सर्वनाश समीप है ? ॥७॥

निज पूर्वजों का वह अलौकिक सत्य, शील निहार लो,
फिर ध्यान से अपनी दशा भी एक बार विचार लो।
जो आज अपने आपको यों भूल हम जाते नहीं,
तो यों कभी सन्ताप-मूलक शूल हम पाते नहीं ॥ ८ ॥

निज पूर्वजों के सद्गुणों को यत्न से मन में धरो,
सब आत्म-परिभव-भाव तज निज रूप का चिन्तन करो।
निज पूर्वजों के सद्गुणों का गर्व जो रखती नहीं,
वह जाति जीवित जातियों में रह नहीं सकती कहीं ॥९॥

किस भाँति जीना चाहिए, किस भाँति मरना चाहिए;
सो सब हमें निज पूर्वजों से याद करना चाहिए।
पद-चिह्न उनके यत्न-पूर्वक खोज लेना चाहिए,
निज पूर्व-गौरव-दीप को बुझने न देना चाहिए ॥ १० ॥

हम हिन्दुओं के सामने आदर्श जैसे प्राप्त हैं-
संसार में किस जाति को, किस ठौर वैसे प्राप्त हैं ?
भव-सिन्धु में निज पूर्वजों की रीति से ही हम तरें,
यदि हो सकें वैसे न हम तो अनुकरण तो भी करें ॥११॥

क्या कार्य्य दुष्कर है भला यदि इष्ट हो हमको कहीं,
उस सृष्टिकर्ता ईश का ईशत्व क्या हममें नहीं ?
यदि हम किसी भी कार्य को करते हुए असमर्थ हैं-
तो उस अखिल-कर्ता पिता के पुत्र ही हम व्यर्थ हैं ॥ १२ ॥

अपनी प्रयोजन-पूर्ति क्या हम आप कर सकते नहीं ?
क्या तीस कोटि मनुष्य अपना ताप हर सकते नहीं ?
क्या हम सभी मानव नहीं किंवा हमारे कर नहीं ?
रो भी उठे हम तो बने क्या अन्य रत्नाकर नहीं? ॥ १३ ॥

हे भाइयो ! सोए बहुत, अब तो उठो, जागो अहो !
देखो जरा अपनी दशा, आलस्य को त्यागो अहो !
कुछ पार है, क्या-क्या समय के उलट-फेर न हो चुके !
अब भी सजग होगे न क्या ? सर्वस्व तो हो खो चुके ॥ १४ ॥

विष-पूर्ण ईर्ष्या-द्वेष पहले शीघ्रता से छोड़ दो,
घर फूंकनेवाली फुटैली फूट का सिर फोड़ दो।
मालिन्य से मुँह मोड़कर मद-मोह के पद तोड़ दो,
टूटे हुए वे प्रेम-बन्धन फिर परस्पर जोड़ दो ॥ १५ ॥

भागो अलग अविचार से, त्यागो कुसंग कुरीति का;
आगे बढ़ो निर्भीकता से, काम है क्या भीति का-
चिन्ता न विघ्नों की करो, पाणिग्रहण कर नीति का।
सुर-तुल्य अजरामर बनो, पीयूष पीकर प्रीति का ॥ १६॥

संसार की समरस्थली में धीरता धारण करो,
चलते हुए निज इष्ट पथ में संकटों से मत डरो।
जीते हुए भी मृतक-सम रहकर न केवल दिन भरो,
वर वीर बनकर आप अपनी विघ्न-बाधाएँ हरो ॥ १७ ॥

है ज्ञात क्या तुमको नहीं, तुम लोग तीस करोड़ हो,
यदि ऐक्य हो तो फिर तुम्हारा कौन जग में जोड़ हो ?
उत्साह-जल से सींचकर हित का अखाड़ा गोड़ दो,
गर्दन अमित्र अधःपतन की ताल ठोंक मरोड़ दो ॥ १८ ॥

बैठे हुए हो व्यर्थ क्यों ? आगे बढ़ो, ऊँचे चढ़ो;
है भाग्य की क्या भावना ? अब पाठ पौरुष का पढ़ो।
है सामने का ग्रास भी मुख में स्वयं जाता नहीं !
हा ! ध्यान उद्यम का तुम्हें तो भी कभी आता नहीं! ॥ १९ ॥

जो लोग पीछे थे तुम्हारे, बढ़ गए, हैं बढ़ रहे,
पीछे पड़े तुम दैव के सिर दोष अपना मढ़ रहे !
पर कर्म-तैल बिना कभी विधि-दीप जल सकता नहीं,
है दैव क्या ? साँचे बिना कुछ आप ढल सकता नहीं ॥ २० ॥

आओ, मिलें सब देश-बान्धव हार बनकर देश के,
साधक बनें सब प्रेम से सुख-शान्तिमय उद्देश के।
क्या साम्प्रदायिक भेद से है ऐक्य मिट सकता अहो !
बनती नहीं क्या एक माला विविध सुमनों की कहो ? ॥ २१ ॥

रक्खो परस्पर मेल मन से छोड़कर अविवेकता,
मन का मिलन ही मिलन है, होती उसी से एकता।
तन मात्र के ही मेल से है मन भला मिलता कहीं,
है बाह्य बातों से कभी अन्तःकरण खिलता नहीं ॥ २२ ॥

सब वैर और विरोध का बल-बोध से वारण करो,
है भिन्नता में खिन्नता ही, एकता धारण करो।
है एकता ही मुक्ति ईश्वर-जीव के सम्बन्ध में,
वर्णैकता ही अर्थ देती इस निकृष्ट निबन्ध में ॥ २३ ॥

है कार्य्य ऐसा कौन-सा साधे न जिसको एकता ?
देती नहीं अद्भुत अलौकिक शक्ति किसको एकता ?
दो-एक एकादश हुए, किसने नहीं देखे सुने ?
हाँ, शून्य के भी योग से हैं अंक होते दस गुने ॥ २४ ॥

प्रत्येक जन प्रत्येक जन को बन्धु अपना जान लो,
सुख-दुःख अपने बन्धुओं का आप अपना मान लो।
सब दुःख यों बँटकर घटेगा सौख्य पावेंगे सभी,
हाँ, शोक में भी सान्त्वना के गीत गावेंगे सभी ॥ २५ ॥

साहाय्य दे सकते मनुज को मनुज ही, खग-मृग नहीं,
वे भी न दें तो सब मनुजता व्यर्थ है उनकी वहीं।
निज बन्धुओं की ही न हम यदि पा सके प्रियता यहाँ ?
तो उस परम प्रभु की कृपा-प्रियता हमें रक्खी कहाँ ॥ २६ ॥

अपने सहायक आप हो, होगा सहायक प्रभु तभी,
बस चाहने से ही किसी को सुख नहीं मिलता कभी।
कर, पद, हृदय, दृग, कर्ण तुमको ईश ने सब कुछ दिया,
है कौन ऐसा काम जो तुमसे न जा सकता किया ? ॥ २७ ॥

आने न दो अपने निकट औदास्यमय उत्ताप को,
आत्मावलम्बी हो, न समझो तुच्छ अपने आपको।
है भिन्न परमात्मा तुम्हारे अमर आत्मा से नहीं,
एकत्व वारि-तरंग का भी भंग हो सकता कहीं? ॥ २८ ॥

अति धीरता के साथ अपने कार्य में तत्पर रहो,
आपत्तियों के वार सारे वीरवर बनकर सहो।
सब विघ्न-भय मिट जायँगे, होगी सफलता अन्त में,
फिर कीर्ति फैलेगी हमारी एक बार दिगन्त में ॥२९॥

बढ़कर लता, द्रुम, गुल्म भी हैं फूलते फलते यहाँ,
तो भी समुन्नति-मार्ग में हमलोग चलते हैं कहाँ ?
घन घूमकर ही गरजते हैं, बरसते हैं सब कहीं,
हम किन्तु निष्क्रिय हैं तभी तो तरसते हैं सब कहीं ॥ ३० ॥

जड़ दीप तो देकर हमें आलोक जलता आप है,
पर एक हममें दूसरे को दे रहा सन्ताप है।
क्या हम जड़ों से भी जगत् में हैं गए बीते नहीं ?
हे भाइयो ! इस भाँति तो तुम थे कभी जीते नहीं ॥ ३१ ॥

सोचो कि जीने से हमारे लाभ होता है किसे,
है कौन, मरने से हमारे हानि पहुँचेगी जिसे ?
होकर न होने के बराबर हो रहे हैं हम यहाँ,
दुर्लभ मनुज-जीवन वृथा ही खो रहे हैं हम यहाँ ! ॥ ३२ ॥

हो आप, और सभी जनों को नित्य उत्साहित करो,
उत्पन्न तुम जिसमें हुए, निज देश का कुछ हित करो।
नर-जन्म पाकर लोक में कुछ काम करना चाहिए,
अपना नहीं तो पूर्वजों का नाम करना चाहिए ॥ ३३ ॥

अनुदारता-दर्शक हमारे दूर सब अविवेक हों;
जितने अधिक हों तन भले हैं, मन हमारे एक हों।
आचार में कुछ भेद हों, पर प्रेम हो व्यवहार में,
देखें, हमें फिर कौन सुख मिलता नहीं संसार में ? ॥ ३४ ॥

हमको समय को देखकर ही नित्य चलना चाहिए,
बदले हवा जब जिस तरह हमको बदलना चाहिए।
विपरीत विश्व-प्रवाह के निज नाव जा सकती नहीं;
अब पूर्व की बातें सभी प्रस्ताव पा सकतीं नहीं ॥ ३५ ॥

व्यवसाय अपने व्यर्थ हैं अब नव्य यन्त्रों के बिना,
परतन्त्र हैं हम सब कहीं अब भव्य यन्त्रों के बिना।
कल के हलों के सामने अब पूर्व का हल व्यर्थ है,
उस वाष्प-विद्युद्वेग-सम्मुख देह का बल व्यर्थ है ॥ ३६ ॥

है बदलता रहता समय, उसकी सभी घातें नई,
कल काम में आती नहीं हैं आज की बातें कई !
है सिद्धि-मूल यही कि जब जैसा प्रकृति का रंग हो-
तब ठीक वैसा ही हमारी कार्य-कृति का ढंग हो ॥ ३७ ॥

प्राचीन हों कि नवीन छोड़ो रूढ़ियाँ जो हों बुरी,
बनकर विवेकी तुम दिखाओ हंस जैसी चातुरी।
प्राचीन बातें ही भली हैं, यह विचार अलीक है,
जैसी अवस्था हो जहाँ वैसी व्यवस्था ठीक है ॥ ३८ ॥

सर्वत्र एक अपूर्व युग का हो रहा संचार है,
देखो, दिनोंदिन बढ़ रहा विज्ञान का विस्तार है;
अब तो उठो, क्या पड़ रहे हो व्यर्थ सोच-विचार में ?
सुख दूर, जीना भी कठिन है श्रम बिना संसार में ॥ ३९ ॥

पृथ्वी, पवन, नभ, जल, अनल सब लग रहे हैं काम में,
फिर क्यों तुम्हीं खोते समय हो व्यर्थ के विश्राम में ?
बीते हजारों वर्ष तुमको नींद में सोते हुए,
बैठे रहोगे और कब तक भाग्य को रोते हुए ? ॥ ४० ॥

इस नींद में क्या क्या हुआ, वह भी तुम्हें कुछ ज्ञात है ?
कितनी यहाँ लूटें हुईं , कितना हुआ अपघात है !
होकर न टस से मस रहे तुम एक ही करवट लिये,
निज दुर्दशा के दृश्य सारे स्वप्न-सम देखा किये ! ॥४१॥

इस नींद में ही तो यवन अकर यहाँ आदृत हुए,
जागे न हा ! स्वातन्त्र्य खोकर अन्त में तुम धृत हुए।
इस नींद में ही सब तुम्हारे पूर्व-गौरव हृत हुए,
अब और कब तक इस तरह सोते रहोगे मृत हुए ? ॥४२॥

उत्तप्त ऊष्मा के अनन्तर दीख पड़ती वृष्टि है,
बदली न किन्तु दशा तुम्हारी नित्य शनि की दृष्टि है !
है घूमता फिरता समय तुम किन्तु ज्यों के त्यों पड़े,
फिर भी अभी तक जी रहे हो, वीर ही निश्चय बड़े ! ॥४३॥

पशु और पक्षी आदि भी अपना हिताहित जानते,
पर हाय ! क्या तुम अब उसे भी हो नहीं पहचानते ?
निश्चेष्टता मानों हमारी नष्टता की दृष्टि है,
होती प्रलय के पूर्व जैसे स्तब्ध सारी सृष्टि है ॥ ४४ ॥

सोचो विचारो, तुम कहाँ हो, समय की गति है कहाँ,
वे दिन तुम्हारे आप ही क्या लौट आवेंगे यहाँ ?
ज्यों ज्यों करेंगे देर हम वे और बढ़ते जायेंगे,
यदि बढ़ गये वे और तो फिर हम न उनको पायेंगे ॥४५॥

करके उपेक्षा निज समय को छोड़ बैठे हो तुम्हीं,
दुष्कर्म करके भाग्य को भी फोड़ बैठे हो तुम्हीं।
बैठे रहोगे हाय ! कब तक और यों ही तुम कहो ?
अपनी नहीं तो पूर्वजों की लाज तो रक्खो अहो ! ॥४६॥

लो मार्ग अपना शीघ्र ही कर्तव्य के मैदान में,
हो बद्धपरिकर दो सहारा देश के उत्थान में ।
डूबे न देखो नाव अपनी है पड़ी मंझधार में,
हो। सहायक कर्म्म का पतवार ही उद्धार में ॥ ४७॥

भूलो न ऋषि-सन्तान हो, अब भी तुम्हें यदि ध्यान हो-
तो विश्व को फिर भी तुम्हारी शक्ति का कुछ ज्ञान हो।
बनकर अहो ! फिर कर्मयोगी वीर बड़भागी बनो,
परमार्थ के पीछे जगत में स्वार्थ के त्यागी बनो ॥ ४८ ॥

होकर निराश कभी न बैठो, नित्य उद्योगी रहो,
सब देश-हितकर कार्य में अन्योन्य सहयोगी रहो।
धम्मार्थि के भोगी रहो बस कर्म के योगी रहो,
रोगी रहो तो प्रेम-रूपी रोग के रोगी रहो ! ॥ ४९ ॥

पुरुषत्व दिखलाओ पुरुष हो, बुद्धि-बल से काम लो,
तब तक न थककर तुम कभी अवकाश या विश्राम लो-
जब तक कि भारत पूर्व के पद पर न पुनरासीन हो,
फिर ज्ञान में, विज्ञान में, जब तक न वह स्वाधीन हो ॥ ५० ॥

निज धर्म का पालन करो, चारों फलों की प्राप्ति हो,
दुख-दाह, आधि-व्याधि सबकी एक साथ समाप्ति हो।
ऊपर कि नीचे एक भी सुर है नहीं ऐसा कहीं-
सत्कर्म में रत देख तुमको जो सहायक हो नहीं ॥ ५१ ॥

देखो, तुम्हें पूर्वज तुम्हारे देखते हैं स्वर्ग से,
करते रहे जो लोक का हित उच्च आत्मोत्सर्ग से।
है दुख उन्हें अब स्वर्ग में भी पतित देख तुम्हें अरे !
सन्तान हो क्या तुम उन्हीं की, राम ! राम ! हरे हरे ! ॥ ५२ ॥

अब तो विदा करो दुर्गुणों को सद्गुणों को स्थान दो,
खोया समय यों ही बहुत अब तो उसे सम्मान दो।
चिरकाल तिमिरावृत रहे, आलोक का भी स्वाद लो,
हो योग्य सन्तति, पूर्वजों से दिव्य आशीर्वाद लो ॥ ५३ ॥

जग को दिखा दो यह कि अब भी हम सजीव, सशक्त हैं,
रखते अभी तक नाड़ियों में पूर्वजों का रक्त हैं।
ऐसा नहीं कि मनुष्यरूपी और कोई जन्तु हैं,
अब भी हमारे मस्तकों में ज्ञान के कुछ तन्तु हैं ॥ ५४ ॥

अब भी सँभल जावें कहीं हम, सुलभ हैं सब साज भी,
बनना, बिगड़ना है हमारे हाथ अपना आज भी।
यूनान, मिस्रादिक मिटे हैं किन्तु हम अब भी बने,
यद्यपि हमारे मेटने को ठाठ कितने ही ठने ॥ ५५ ॥

हे आर्य सन्तानो ! उठो, अवसर निकल जावे नहीं
देखो, बड़ों की बात जग में बिगड़ने पावे नहीं।
जग जान ले कि न आर्य केवल नाम के ही आर्य्य हैं,
वे नाम के अनुरूप ही करते सदा शुभ कार्य हैं ॥ ५६ ॥

ऐसा करो जिसमें तुम्हारे देश का उद्धार हो,
जर्जर तुम्हारी जाति का बेड़ा विपद से पार हो।
ऐसा न हो जो अन्त में, चर्चा करें ऐसी सभी-
थी एक हिन्दू नाम की भी निन्द्य जाति यहाँ कभी ॥ ५७ ॥

समझो न भारत-भक्ति केवल भूमि के ही प्रेम को,
चाहो सदा निज देशवासी बन्धुओं के क्षेम को।
यों तो सभी जड़ जन्तु भी स्वस्थान के अति भक्त हैं;
कृमि, कीट, खग, मृग, मीन भी हमसे अधिक अनुरक्त हैं ॥ ५८ ॥

लाखों हमारे दीन-दुःखी बन्धु भूखों मर रहे,
पर हम व्यसन में डूबकर कितना अपव्यय कर रहे !
क्या देश वत्सलता यही है ? क्या यही सत्कार्य है ?
क्या लक्ष्य जीवन का यही है ? क्या यही औदार्य है? ॥ ५९॥

मुख से न होकर चित्त से देशानुरागी हो सदा,
हैं सब स्वदेशी बन्धु, उनके दुःखभागी हो सदा।
देकर उन्हें साहाय्य भरसक सब विपत्ति-व्यथा हरो,
निज दुःख से ही दूसरों के दुःख का अनुभव करो ॥ ६० ॥

अन्तःकरण उज्ज्वल करो औदार्य के आलोक से,
निर्मल बनो सन्तप्त होकर दूसरों के शोक से।
आत्मा तुम्हारा और सबका एक निरवच्छेद है,
कुछ भेद बाहर क्यों न हो भीतर भला क्या भेद है? ॥ ६१ ॥

सबसे बड़ा गौरव यही तो है हमारे ज्ञान का,
जानें चराचर विश्व को हम रूप उस भगवान् का।
ईशस्थ सारी सृष्टि हममें और हम सब सृष्टि में,
है दर्शनों में दृष्टि जैसे और दर्शन दृष्टि में ॥ ६२ ॥

सबसे हमारे धर्म का ऊँचा यही तो लक्ष है,
होती असीम अनेकता में एकता प्रत्यक्ष है।
मति की चरमता या परमता है वही अविभिन्नता,
बस छा रही सर्वत्र प्रभु की एक निरवच्छिन्नता ॥ ६३ ॥

भगवान कहते हैं स्वयं ही, भेद-भावों को तजे,
है रूप मेरा ही, मुझे जो सर्व भूतों में भजे।
जो जानता सबमें मुझे, सबको मुझी में जानता;
है मानता मुझको वही, मैं भी उसी को मानता ॥ ६४ ॥

(इस पद्य की रचना श्रीमद्भगवद्गीता के निम्नलिखित
श्लोक के आधार पर की गई है :
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्व च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति ॥
सर्व भूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते ।)

हे भाइयो ! भगवान् के आदेश का पालन करो,
अनुदार भाव-कलंक-रूपी पंक प्रक्षालन करो।
नवनीत-तुल्य दयार्द्र हो सब भाइयों के ताप में,
सबमें समझकर आपको, सबको समझ लो आपमें ॥ ६५ ॥

बस मर्म स्वार्थ-त्याग ही तो है हमारे धर्म का,
है ईश्वरार्पण सर्वदा सब फल हमारे कर्म का।
निष्काम होना ही हमारा निरुपमेय महत्त्व है,
प्रभु का स्वयं श्रीमुख कथित गीता-ग्रथित यह तत्त्व है ॥ ६६ ॥

इतिहास है, हम पूर्व में स्वार्थी कभी होते न थे;
सुख-बीज हम अपने लिए ही विश्व में बोते न थे।
तब तो हमारे अर्थ यह संसार ही सुख-स्वर्ग था;
मानो हमारे हाथ पर रक्खा हुआ अपवर्ग था ॥ ६७ ॥

हम पर-हितार्थ सहर्ष अपने प्राण भी देते रहे,
हाँ, लोक के उपकार-हित ही जन्म हम लेते रहे।
सुर भी परीक्षक हैं हमारे धर्म के अनुराग के,
इतिहास और पुराण हैं साक्षी हमारे त्याग के ॥६८॥

हैं जानते यह तत्व जो जन आज भी वे मान्य हैं,
चाहे विना ही पा रहे वे सब कहीं प्राधान्य हैं।
जग में न उनको प्राप्त हो जो कौन ऐसी सिद्धि है ?
उनके पदों पर लोटती सब ऋद्धियों की वृद्धि है ॥६९॥

करते उपेक्षा यदि न हम उस उच्चतम उद्देश की,
तो आज यह अवनति नहीं होती हमारे देश की।
यदि इस समय भी सजग हों तो भी हमारा भाग्य है,
पर कर्म के तो नाम से ही अब हमें वैराग्य है ! ॥७०॥

सच्चे प्रयत्न कभी हमारे व्यर्थ हो सकते नहीं,
संसार भर के विघ्न भी उनको डुबो सकते नहीं !
वे तत्वदर्शी ऋषि हमारे कह रहे हैं यह कथा-
“सत्यप्रतिष्ठायां क्रिया (सु) फलाश्रयत्वं” सर्वथा ॥७१॥

आओ, बने शुभ साधना के आज से साधक सभी,
निज धर्म की रक्षा करें, जीवन सफल होगा तभी।
संसार अब देखे कि यदि हम आज हैं पिछड़े पड़े-
तो कल बराबर और परसों विश्व के आगे खड़े ॥७२॥

ब्राह्मण बढ़ावें बोध को, क्षत्रिय बढ़ावें शक्ति को;
सब वैश्य निज वाणिज्य को, त्यों शूद्र भी अनुरक्ति को।
यों एक मन होकर सभी कर्तव्य के पालक बनें –
तो क्या न कीर्ति-वितान चारों ओर भारत के तनें ?॥७३॥

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