उद्धव  (यशोदा के प्रति)-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar 

उद्धव  (यशोदा के प्रति)-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

 

उद्धव
(यशोदा के प्रति)

अम्ब यशोदे, रोती है तू?
गर्व क्यों नहीं करती?
भरी भरी फिरती है तेरे
अंचल-धन से धरती ।

अब शिशु नहीं, सयाना है वह,
पर तू यह जानें क्या?
आया है वह तेरी माखन-
मिसरी ही खाने क्या?

खेल-खिलौने के दिन उसके
बीत गये वे मैया;
यही भला, निज कार्य करे अब
तेरा कुंवर-कन्हैया।

उसे बाँधना तुझे रुचेगा
क्या अब भी ऊखल से?
काट रहा है वह सुजनों के
भय-बंधन निज बल से ।

उसे डिठौना देने का मन
क्या अब भी है, कह तो?
प्रेत-पिशाच झाड़ने आया
मनुष्यत्व के वह तो!

तेरी गायों को तो कोई
चरा लायगा वन में;
पर उदण्ड-द्विपद-षण्डों का
शासक वही भुवन में।

हाँ, वह कोमल है सचमुच ही
वह कोमल है कितना ?
मैं इतना ही कह सकता हूं,
तेरा मक्खन जितना।

बना उसी से तो उसका तन,
तूने आप बनाया;
तब तो ताप देख अपनों का
पिघल उठा, उठ धाया।

पर अपने मक्खन के बल की
भूल न आप बड़ाई,
भूला नहीं स्वयं वह उसकी
गरिमा, तेरी गायी ।

कितने तृणावर्त तिनके-से
यहाँ उसी ने झाड़े;
मैं क्या कहूं, वहाँ कैसे क्या
मोटे मल्ल पछाड़े!

कहाँ नाग-नग, कहाँ रत्न-सा
छोटा तेरा छौना ।
चला कुवलयापीड़ झटकने
नील सरोज सलौना ।

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