उद्धव (गोपियों के प्रति)-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

उद्धव (गोपियों के प्रति)-द्वापर -मैथिलीशरण गुप्त -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Maithilisharan Gupt Dwapar

 उद्धव
(गोपियों के प्रति)

अहा! गोपियों की यह गोष्ठी,
वर्षा की ऊषा-सी;
व्यस्त-ससम्भ्रम उठ दौड़े की
स्खलित ललित भूषा-सी।

श्रम कर जो क्रम खोज रही हो,
उस भ्रमशीला स्मृति-सी;
एक अतर्कित स्वप्न देखकर
चकित चौंकती धृति-सी।

हो होकर भी हुई न पूरी,
ऐसी अभिलाषा-सी;
कुछ अटकी आशा-सी, भटकी
भावुक की भाषा-सी।

सत्य-धर्म-रक्षा हो जिससे,
ऐसी मर्म मृषा-सी;
कलश कूप में, पाश हाथ में,
ऐसी भ्रान्त तृषा-सी!

उस थकान-सी, ठीक मध्य में
जो पथ के आई हो!
कूद गये मृग की हरिणी-सी,
जो न कूद पाई हो!

तुल्य-दु:ख में हत-ईर्ष्या-सी;
विश्व-व्याप्त समता-सी,
जिसको अपना मोह न हो, उस
मूर्त्ति-मती ममता-सी ।

लिखा गया जिसमें विशेष कुछ,
ऐसी लोहित मसि-सी;
किसी छुरी के क्षुद्र म्यान में
ठूंस दी गयी असि-सी!

सम्पुटिकता होकर भी अलि को
धर न सकी नलिनी-सी;
अथवा शून्य-वृन्त पर उड़ कर
मंडराई अलिनी-सी ।

पिक-रव सुनने को उत्कर्णा
मधुपर्णा लतिका-सी;
प्रोषितपतिका पूर्वस्मृति में
रत आगतपतिका-सी!

जो सबको देखे पर निज को
भूल जाय उस मति-सी;
अपने परमात्मा से बिछुड़े
जीवात्मा की गति-सी!

चन्द्रोदय की बाट जोहती
तिमिर-तार-माला-सी;
एक एक व्रज-बाला बैठी
जागरूक ज्वाला-सी!

अहो प्रीति की मूर्ति, जगत में
जीवन धन्य तुम्हारा;
कर न सका अनुसरण कठिनतम
कोई अन्य तुम्हारा।

Leave a Reply