उत्सर्ग-चतुर्थ खंड : चक्रव्यूह : लिपटी परछाइयाँ-कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

उत्सर्ग-चतुर्थ खंड : चक्रव्यूह : लिपटी परछाइयाँ-कुँवर नारायण-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kunwar Narayan

हैं मुझे स्वीकार
मेरे वन, अकेलेपन, परिस्थिति के सभी कांटे :

ये दधीची हड्डियां
हर दाह में तप लें,
न जाने कौन दैवी आसुरी संघर्ष बाक़ी हों अभी,
जिसमें तपाई हड्डियां मेरी
यशस्वी हों,
न जाने किस घड़ी के देन से मेरी
करोड़ों त्याग के आदर्श
विजयी हों :

जिसे मैं आज सह लूँ
कल वही देवत्व हो जाए,
न जाने कौन-सा उत्सर्ग
बढ़ अमरत्व हो जाए।

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