उत्तर-कथा-कविताएं_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

उत्तर-कथा-कविताएं_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

नौदुर्गों की साँझ में गली के छोर से आती थी
विह्नल करती चौपाई-गायन की आवाज़
सोरठे तक आते-आते गहराने लगती थी रात
जीवन खड़ा हो जाता था रँगमँच के आगे

रास्तों में मिलते थे झरे हुए फूल
चितवनें, वाटिकाएँ, छली, बली, मूर्च्छाएँ
और उन्हीं के बीच उठती पुत्र-मोह की अन्तिम पुकार
नावों, जँगलों, गांवों और पुलों से होकर गुज़रते थे
राग-विराग, ब्रह्मास्त्र और वरदान के बाद के विलाप
लेकिन नहीं खेली जाती थी अश्वमेध की लीला

जो अब उत्तर-कथा में खेली जा रही है दिन-रात
जिसे कलाकार नहीं, बार-बार खेलते हैं वानर-दल
गठित हो रही हैं नई-नई सेनाएँं
रोज़ एक नाटक खड़ा हो जाता है जीवन के आगे ।

 

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