उजाड़-क्रूरता_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

उजाड़-क्रूरता_कविता संग्रह-कुमार अंबुज-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Kumar Ambuj

 

वहाँ इतना उजाड़ था कि दर्शनीय स्थल हो गया था

दूर-दूर से आ रहे थे लोग
छुट्टी का दिन था सो
बहुत थीं लड़कियाँ और स्त्रियाँ भी
आबादी से ऊबे हुए लोगों की एक नई आबादी थी वहाँ
इतिहासकारों और जिज्ञासु छात्रों का भी एक झुंड था
एक दार्शनिकनुमा आदमी एक तरफ़
अपने कैमरे से खींच रहा था उजाड़

धूप तेज़ थी और उजड़ गई चीज़ों पर गिर रही थी
चीज़ों की उदासी चमक रही थी धूप में
जैसे भीड़ को देख कर
मरियल गाइड की आँखें

एक सभ्यता का ध्वंस था वहाँ
कुछ लिपियाँ थीं
और चित्रकला की प्रारम्भिक स्थितियाँ
चट्टानों के बीच गूंजती थी वहाँ पूर्वजों की स्मृति

लोगों ने उजाड़ को रौंदते हुए
उसे बदल डाला था मौज-मस्ती में
हम सबके चले जाने के बाद शायद
निखार पर आएगा उजाड़ का सौंदर्य
साँझ होगी और उजाड़, मैंने सोचा-
अपनी गुफा में रहने चला जाएगा
जिस तरह अपने अकेलेपन में
मनुष्य वापस जाता है अपने ही भीतर

उजाड़ और मनुष्य के अकेलेपन को
आज तक किसी ने नहीं देखा है।

 

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