उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥
धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥१॥
सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंन्हि ॥
जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥१॥ रहाउ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥
ढठीआ कमि न आवन्ही विचहु सखणीआहा ॥२॥
बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंन्हि ॥
घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअन्हि ॥३॥
सिमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंन्हि ॥
से फल कमि न आवन्ही ते गुण मै तनि हंन्हि ॥४॥
अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥
अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥५॥
चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥
नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥६॥१॥३॥(729)॥

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