उख मै प्यूख रस रसना रहत होइ-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

उख मै प्यूख रस रसना रहत होइ-कबित्त-भाई गुरदास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Bhai Gurdas Ji

उख मै प्यूख रस रसना रहत होइ
चन्दन सुबास तास नासका न होत है ।
नाद बाद सुरति बेहून बिसमाद गति
बिबिध बरन बिनु द्रिसटि सो जोति है ।
पारस परस न सपरस उसन सीत
कर चरन हीन धर अउखदी उदोत है ।
जाय पंच दोख निरदोख मोख पावै कैसे
गुरमुखि सहज संतोख हुइ अछोत है ॥१९८॥

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