उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के-कुछ और नज्में -गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के-कुछ और नज्में -गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

उखाड़ दो अरज़-ओ-तूल खूँटों से बस्तियों के
समेटो सड़कें, लपेटो राहें
उखाड़ दो शहर का कशीदा
कि ईंट-गारे से घर नहीं बन सका किसी का

पनाह मिल जाये रूह को जिसका हाथ छूकर
उसी हथेली पर घर बना लो
कि घर वही है
पनाह भी है।
तुम्हारे हाथों में मैंने देखी थी एक अपनी लकीर, सोनाँ

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