ईश्वर की देह-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar 

ईश्वर की देह-आत्मा की आँखें -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

ईश्वर वह प्रेरणा है,
जिसे अब तक शरीर नहीं मिल है।
टहनी के भीतर अकुल्राता हुआ फूल,
जो वृन्त पर अब तक नहीं खिला है।

लेकिन, रचना का दर्द छटपटाता है,
ईश्वर बराबर अवतार लेने को अकुल्राता है ।

इसीलिए, जब तब हम
ईश्वरीय विभूति का प्रसार देखते हैं ।
आदमी के भीतर
छोटा-मोटा अवतार देखते हैं ।

जब भी कोई ‘हेलेन’,
शकुन्तला या रुपमती आती है,
अपने रुप और माधुर्य में …
ईश्वरीय विभूती की झलक दिखा जाती है ।

और जो भी पुरुष
निष्पाप है, निष्कलंक है, निडर है,उसे प्रणाम करो,
क्योंकि वह छोटा-मोटा ईश्वर है ।

ईश्वर उड़नेवाली मछली है ।
झरनों में हहराता दूध के समान सफेद जल है ।
ईश्वर देवदार का पेड़ है ।
ईश्वर गुलाब है, ईश्वर कमल है ।

मस्ती में गाते हुए मर्द,
धूप में बैठ बालों में कंघी करती हुई नारियाँ,
तितलियों के पीछे दौड़ते हुए बच्चे,
फुलवारियों में फूल चुनती हुई सुकुमारियाँ,
ये सब के सब ईश्वर हैं ।
क्योंकि जैसे ईसा और राम आये थे,
ये भी उसी प्रकार आये हैं।
और ईश्वर की कुछ थोडी विभूती
अपने साथ लाये हैं ।

ये हैं ईश्वर-
जिनके भीतर कोई अतौकिक प्रकाश जलता है ।
लेकिन, वह शक्ति कौन है,
जिसका पता नहीं चलता है ?

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