इस समय में- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

इस समय में- कविता -अब्दुर रहमान राही -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Abdur Rehman Rahi

 

देखा लोगों ने इक दिन इक लोवा
अकुलाया, अचिराया दौड़ रहा
गिरते-पड़ते आहत होकर
जान बचाने की चिन्ता में
वन से निकल, मैदान लाँघता
भागा-भागा बाज़ार से निकला

देखा लोगों ने, रोका, पूछा :
लोवे! सब ठीक तो है ना?
थर्राया घबराया तू किधर जा रहा
जुल्मी कोई पीछे है क्या?

दम ले कर, देख इधर-उधर
लोवे ने मुँह अपना खोला
बोला : मेरे प्यारे मित्रो!
यूँ ही नहीं हड़बड़ में हूँ
उड़ती-सी इक ख़बर सुनी है
बस तब से यह हाल हुआ है
मुल्क़ में अब बेगार लगी है
हाकिम का ऐलान हुआ है

‘जहाँ कहीं भी ऊँट मिलेगा
करवा लो सामान ढुलाई’
यही सुन-सुन सहम गया हूँ
ऊँटों की बेगार शुरू है

मूर्ख बातें लोवे की सुन
लोगों ने अट्टहास लगाया कहा,
यह मतिभ्रष्ट हुआ है
हम समझे थे कुछ बुरा हुआ है
तुम तो सच में ही पागल हो
ऊँटों की बेगार, तुझे क्या
तू मुश्किल से गीदड़ जितना
तू कैसे है ऊँटों जैसा
तू फिरता क्यों मारा-मारा
बोलो क्या है, क्या चिन्ता है

ऐसी सूक्ष्म बातें सुन कर
लोवा जीभ दबा के बोला :
हे मित्रो!
इस समय की बात अजब है, ढूँढ़ निराली
झल्लाहट में यदि कोई आया
और बताया
यह है ऊँट के बच्चे जैसा
तब कोई ना क़द देखेगा
रंग देखेगा
मैं भी बेगार में जुट जाऊँगा
जब तक सच प्रकट हो सारा
तब तक जाने क्या हो जाए!

(गुलिस्तान-ए-सैदी से प्रेरित)

 

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