इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 4

इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 4

 

पाप

अपने पापों को
आटे में गूँथकर पेड़ा बनाइये
अपने हाथों पेड़ा गाय को खिलाइये
और फिर से पाप करने में जुट जाइये।

 

दुनिया के सबसे अच्छे लोग

सबसे पहले अपना दिमाग़
किसी धर्मगुरु की अँधेरी गुफा में फेंक आते हैं
दुनिया के सबसे अच्छे लोग
ये निरंतर नाम जपते हैं
और आज्ञाकारी होते जाते हैं
ये जीवन-भर खटते रहते हैं
धर्मगुरु के खेतों और कारख़ानों में
जिस भी रास्ते से गुज़रता है धर्मगुरु
उस रास्ते पर तनी रहती हैं इनकी लाठियाँ
कि धर्मगुरु के आराम में ख़लल न ड़ाले
कोई परिंदा, जानवर या इन्सान
जब भी आज्ञा होती है
ये सड़कें रोक देते हैं
या बसें जला देते हैं
रक्तदान करते हैं
या बुहार देते हैं शहर का कूड़ा
और आज्ञा होते ही शहर को
कूड़ेदान में बदल देते हैं
धर्मगुरु को ख़ुश करने के लिए
कभी-कभी कर लेते हैं आत्मदाह भी
दुनिया के सबसे अच्छे लोग
क़ानून इनके लिए क़ागज़ होता है
और दुनिया गेंद
ये जब चाहें क़ागज़ को
चिंदियों में बदल हवा में उड़ा देते हैं
गेंद को उछाल देते हैं आकाश में
इनके ऐसे कारनामों पर इतने मुग्ध होते हैं
राजा और दरबारी कि धर्मगुरु के चरणों में
विह्वल होकर झुके रहते हैं इनके शीश
बाढ़ से उफनती नदी-सा
सब तरफ़ फैला है इनका प्रभुत्व
इसी बाढ़-से प्रभुत्व में डूबती-उतराती रही हैं
सारी सत्ताएँ, सारी व्यवस्थाएँ
सतत प्रयत्नशील रहते हैं राजा और दरबारी
कि उन पर कृपादृष्टि बनाए रखें धर्मगुरु
और हमेशा उनके मददगार बने रहें
दुनिया के सबसे अच्छे लोग।

 

दिमाग़

‘मैंने अपना दिमाग़ तुम्हारे पास गिरवी रखकर
तुमसे नामदान लिया था धर्मगुरु
ब्याज के रूप में मैंने तुम्हें सौंप दी
अपनी आधी ज़िंदगी
इस दौरान मेरी ज़िंदगी में मेरा कुछ नहीं था
जो कुछ था वो तुम्हारा था
तुमने जो सोचने के लिए कहा, मैंने वही सोचा
तुमने जो करने के लिए कहा, मैंने वही किया
मैं हर उस जगह को अपनी पलकों से बुहारता रहा
जहाँ-जहाँ तुम्हारे चरण पड़ते रहे
तुम जब भी दिखे, मैंने दण्डवत् प्रणाम किया
नहीं दिखे तो तुम्हारी तस्वीर के सामने
हाथ जोड़े खड़ा रहा रात-दिन
मेरी जुबान तुम्हारे दिए नाम को बुदबुदाती रही
कहीं तुम्हारी निंदा होती तो त्याग देता वह जगह
तुम्होरे लिए भिड़ जाता रहा मैं मेरे अपनों से
अब बाक़ी बची ज़िदगी मैं अपने लिए जीना चाहता हूँ
इसलिए अपना नाम वापस लो
और मुझे मेरा दिमाग़ लौटा दो धर्मगुरु!
भौंचक हैं धर्मगुरु
आज तक किसी ने वापस नहीं माँगा अपना गिरवी दिमाग़
लाखों दिमाग़ बोरों में बंद आश्रम के कूड़ाघर में पड़े हैं।
दफ़न होने की प्रतीक्षा में
लाखों दफ़न किए जा चुके हैं पहले ही
अब क्या करें धर्मगुरु, कुछ समझ नहीं आता
वे तय करते हैं आपात् बैठक बुलाएँ प्रबंधकों की
प्रबंधकों की बैठक में गहन मंत्रणा के बाद
समिति के अध्यक्ष ने बाहर बैठे उस आदमी से कहा-
‘हमारे साथ चलो और पहचानो अपना दिमाग़’
थोड़ी देर बाद अध्यक्ष धर्मगुरु के सामने था-
‘आप निश्चिंत हो जाइए धर्मगुरु
अब कभी कोई वापस नहीं माँगेगा अपना दिमाग़
ऐसे लोगों के लिए बना दिया गया है नया क़ानून
ठीक वैसा जैसा आप ने कहा था’
बरसों बीत गए हैं
अपने गिरवी दिमाग़ धर्मगुरु से वापस पाने के इच्छुक लोग
उस आदमी के लौट आने की प्रतीक्षा कर रहे हैं
जो नाम लौटाकर अपना दिमाग़ वापस लाने
आश्रम के भीतर गया था।

 

निज़ाम

हर सुबह चिड़िया
गाय के गोबर को खँगालती
गोबर से अलगा कर अपनी चोंच बीनती
गोबर में छिपे अनाज के दाने
मैं हर रोज़ उसे देखता
मुझे देखते देखती
तो उड़ जाती चिड़िया
धीरे-धीरे मेरी उपस्थिति की
निरापदता की अभ्यस्त होती गई चिड़िया
चिड़िया अक्सर मुझे देखती
और पूरी तन्मयता से
अपना काम करती रहती
जैसे कि मैं होऊँ ही नहीं
अब तो वह मेरे
पैर पटकने पर भी नहीं उड़ती
ढीठ हो गई है वह
देश के निज़ाम की तरह
जो बिना किसी डर और शर्म के
दानों को गोबर में बदल रहा है।

 

राहत शिविर

अपने ही मुल्क में
अपने घरों से बेघर
ये लोग रहते हैं राहत शिविरों में
तम्बू की छत इतनी नीची
कि सर उठाकर इनमें घुसा नहीं जा सकता
कभी-कभी कैमरे पहुँचते हैं वहाँ
तब हम देख पाते हैं
मर्दों के गालों के दढ़ियल गड्ढ़ों में
तरल अँधेरे-सा हिचकोले खाता संताप
औरतों की सूनी आँखों में कौंधता घर
सर पर चीकट टोपी ओढ़े बच्चे की
ख़ौफ़ज़दा मासूम मुस्कुराहट
औरतों का दिन लकड़ियाँ बीनने में गुज़रता है
और रात आग जलाने में
लकड़ियाँ राख हो जाती हैं
पर तम्बू के भीतर का शीत
अजर-अमर बना रहता है आत्मा की तरह
हर आँख किसी मसीहे का इंतज़ार करती है
ऐसे में बहुत मुमकिन है
कि मसीहे के भेस में
इनका हाथ थाम ले कोई शैतान !

 

गाँव से लौटते हुए

गाँव से लौटने लगा
तो भाई कंधे पर उठा लाया
बीस-पच्चीस किलो बाजरा
माँ ने गाड़ी की डिक्की में रख दिया
दो-ढाई किलो घी
और सरसों का तेल
भाई की पत्नी उठा लाई
पाँच-छह किलो मूँग

मैंने माँ से आशीष ली
फिर हड़ियल भाई को देखा
सैंतीस की उम्र में बूढ़ा लगा भाई
उसकी पाँच साल की बेटी
उसकी टाँग पकड़े खड़ी थी
और मेरी कार को देख रही थी

मुझे लगा
भाई के बच्चों के मुँह से
छीने जा रहा हूँ
बीस-पच्चीस दिनों का भोजन
गाड़ी स्टार्ट हुई
तो भाई पैर छूकर बोला-
आ जाया कीजिए
दो-चार महीने में एकाध बार

उसकी आँखों में
मणियाँ दिपदिपा रहीं थीं
और धँसी गालों में
महक रहे थे गुलाब।

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