इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 2

इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 2

झील

मैं झील हूँ
जीवन की शुष्क ढलान पर लटकी
अटकी किसी पथरीली चट्टान में

कभी मुझे हर समय
छूकर गुज़रती थी चंदनी हवा
मैं झूम-झूम जाती
मेरे किनारे के पेड़ मुझे बूँद-बूँद पीते
मेरे जल में भीगती रहती धानी दूब
कभी मुझे इस तरह से झिंझोड़ती हवा
कि मैं पत्थरों से टकरा जाती
व्यथा से कराह उठती
पर उस व्यथा से भी चंदन की गंध आती थी
निरंतर गतिशील थी मैं और ऊर्जस्वित
फिर एक दिन रास्ता बदल गई चंदनी हवा
लुप्त हो गई मेरी ऊर्जा
गति जड़ हो गई
सड़ने लगा जल,
मैंने व्यग्र होकर हवा को पुकारा
कि देखो मैं सड़ रही हूँ
गल रही हूँ
छू लो मुझे
उत्तर में मुझ तक पहुंची मर्मर ध्वनि-
‘तुम सूख क्यों नहीं जातीं’
मैं भी चाहती हूँ सूख जाऊँ
पर पता नहीं
मेरी पथरीली गहराइयों में कहाँ छुपा है
कोई सोता
कि मैं सूख भी नहीं पाती।

 

तर्क

मेरे सपनों का परिंदा आकाश में उड़ा
कि तुम्हारे तर्क के तीर ने
उसे बेंधकर धरती पर पटक दिया
मैंने तुम्हारे सामने खोला अपना हृदय
कि जिसमें तुम्हारे लिए उमड़ते थे
प्रेम के अथाह समंदर
तुम्हारे निर्मम तर्क ने हृदय को
माँस के एक वीभत्स लोथड़े में बदल दिया
मैं तितली के पंखों के रंग देख रहा था
कि देखते ही देखते स्याह हो गए सारे रंग

कभी तुम छलछलाती नदी नज़र आती हो
फिर पल भर में ही जलती रेत हो जाती हो
लगता है छू लिया तो जल जाऊँगा
मुझे तुमसे ड़र लगता है
तुम तिरोहित कर देती हो वो सारी वजहें
जिनसे कि सृष्टि में बना है आकर्षण
तुम्हारी मौजूदगी में पदार्थ हो जाती हैं
सारी संवेदनाएँ

किसी दिन
हम दोनों के बीच मेज़ पर
स्फटिक की गेंद-सा रखा होगा हमारा प्यार
हम उस गेंद के मध्य से
मुग्ध होकर एक-दूसरे को देखते होंगे
कि सहसा लुप्त हो जाएगी गेंद
तुम अचानक गुर्रा उठोगी-
‘कौन हो तुम
और यहाँ क्या कर रहे हो ?’

 

स्मृतियाँ

स्मृतियाँ सूरज होती हैं
सूने-अँधेरे घर में
छाया रहता है स्मृतियों का आलोक

स्मृतियाँ नाव होती हैं
जिसमें बैठ हम पार कर जाते हैं
दुःखों का समुद्र

स्मृतियाँ बादल होती हैं
बरसती हैं
हमारे मन की सूखी रेत पर

स्मृतियाँ छलावा भी होती हैं
कभी किसी अंधे मोड़ पर
अचानक गुम हो जाती हैं
हमें अकेला छोड़कर।

 

उड़ान

सबसे पहले घोंसला छूटता है
घोंसले के साथ माँ-बाप
फिर पेड़ छूटता है
पेड़ के साथ टहनियों पर बैठे बंधु-बांधव
परिंदा ज्यों-ज्यों ऊपर उड़ता है
पीछे छूट जाते हैं
कतार में एक साथ उड़ते पक्षी
नज़रों से ओझल हो जाती है धरती
साथ छोड़ देती है खुशबू की ड़ोर
जैसे-जैसे आकाश के क़रीब होता जाता है
परिंदा
अकेला होता जाता है

आदमी के बारे में भी यही सच है।

 

आँख

माँ बाँध रही है
बेटी के लिए कितनी ही पोटलियाँ
चने की दाल, मूँग के लड्डू
शक्करपारे, मठरियाँ, ग्वारफली
अलग-अलग बाँधकर
बहुत सँभाल कर
बड़े थैल में रखती जाती है
कि कहीं कुछ छूट-टूट न जाए
कपड़े अलग से रख दिए हैं सूटकेस में
बेटी बाल सँवार रही है
बस अब दो-चार पल में
उसे निकलना है ससुराल के लिए
माँ के दिल से बेटी के लिए निकलती है ख़ामोश दुआ-
“सदा सुखी रहो”
ख़ूब खुश है बेटी ससुराल में
पर माँ की आँख है
भर ही जाती है रह-रह कर।

 

मुल्तान की औरतें

अस्सी पार की ये औरतें
जो चलते हुए काँपती हैं
लडखड़ाती हैं
या लाठी के सहारे
क़दम बढ़ाती हैं धीरे-धीरे
सन सैंतालीस में
ज़िला मुल्तान से आई थीं
जब अचानक बैठे-बिठाए
बदल गया था उनका मुल्क
तब ये युवतियाँ थीं
या युवतियाँ हो जाने वाली थीं
उस वक्त जब समझदार लोग
किसी भी तरह जान बचाना चाहते थे
या सोना-चाँदी
ये लड़कियाँ
तंदूर पर पकती
रोटियों को याद करती थीं
या कुएँ के ठंडे मीठे पानी को
वे अपने साथ लाना चाहती थीं
मुसलमान सहेलियों के होठों पर
छूट गई अपनी हँसी
कपास और शलगम के पौधों पर
छूट गए अपने गीत
पर सामने मौत थी
मौत के जबड़े ख़ून से सने थे
रास्ते में कट गईं कितनी सहेलियाँ
कितनी नहरों में कूद गईं
कितनी क़ैद कर ली गईं
कितनी आग में जल मरीं
इन लड़कियों ने बेबस आँखों से
अपनों को मरते देखा
इन्होंने सुनी
मरते परिजनों की आख़िरी चीख़ें
ये चीख़ें उनकी देह से चिपक गईं
जैसे पत्थर की छाती को
छेनी से काटकर
लिख दी गई हों इबारतें
ये चीख़ें आज भी
उनकी नींद में चली आती हैं
तब ये बूढ़ी औरतें
फिर से युवतियाँ होकर
मूक विलाप करतीं हैं

ये बूढ़ी औरतें हँसती भी हैं
कुएँ के पानी-सी छलछलाती हँसी
पर उनकी हँसी की धवलता में
जाने कहाँ से आ घुलता है लाल रंग
उन्हें हूबहू याद हैं अपने गाँव
अक्सर वे सोचती हैं
अब बूढ़ी हो गई होंगी पीछे छूटी सहेलियाँ
उन्हीं की तरह
उनकी हँसी में भी शायद
कभी घुल जाता होगा लाल रंग
इनमें से एक औरत
सैंतालीस में पोटली में बाँध लाई थी
गाँव की मिट्टी
ये सब औरतें एक साथ
कभी-कभी पोटली खोलती हैं
सूखी मिट्टी
फिर से गीली हो जाती है।

 

प्यास

कोई थका-हारा
प्यासा हिरण
पानी में दाख़िल हो
गले से नीचे उतारता है
एक घूँट पानी
कि तपस्वी की तरह मौन साधे
नदी के तल में
निश्चेष्ट पड़ा मगरमच्छ
झपट कर जकड़ लेता है
उसे अपने जबड़ों में

पता नहीं उस समय
क्या चलता होगा
हिरण के मन में
क्या होगी उसकी प्राथमिकता
जान बचाना
या मर जाने से पहले
प्यास भर पानी पी लेना?

मैंने देखा है
जबड़ों से छूटने की जद्दोजहद में भी
हिरण की थूथन
पानी की ओर लपकती है
उसका भोजन बन जाने से पहले
हिरण बुझा ले अपनी प्यास
इतनी सी भी इजाज़त उसे नहीं देता मगरमच्छ

आख़िर हिरण
कहाँ और कैसे बुझाएँ प्यास
कि पानी के हर स्रोत में
समाधिस्थ हैं मगरमच्छ।

 

पवित्रता

मंदिरों में करोड़ों के गहने
कौन चुपचाप चढ़ा जाता है?
ज़ाहिर है कोई मेहनतकश तो नहीं
दो हाथों की कमाई से तो
पेट भी पूरा नहीं भरता
तो फिर कौन हैं ये दानी
ग़रीब का पेट काट बेइन्तहा धन कमाने वाले
पापमुक्ती के लिए वहीं धन मंदिरों में चढ़ाने वाले
ऐसे धन को स्वीकारने वाले भगवानों के पास
कहाँ बची है इतनी पवित्रता कि
उनके सामने अनायास झुक जाएँ शीश?

 

पाप का घड़ा

अंजुरी भर-भर
घड़े में उँड़ेल दो
अपने सारे पाप
पाप का घड़ा
अभी बहुत ख़ाली है
घड़ा जब तक भरेगा नहीं
ईश्वर कुछ करेगा नहीं।

 

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