इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 1

इसी आकाश में -हरभगवान चावला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Harbhagwan Chawla Part 1

कविता का सूरज

कविता मेरी आत्मा का सूरज है
इस सूरज के उजाले में
दिपदिपा उठते हैं मेरी आत्मा के रत्न
सोया प्रेम जागता है
उनींदी घृणा फुफकारती है
फड़फड़ा उठते हैं गुह्य संवेदन
एक-एक कर लुप्त हो जाते हैं
सारे आवरण
मैं शिशु-सा आवरणहीन होता हूँ
आत्मा के धरातल पर
जब मेरे सामने होता है
कविता का सूरज-
मेरी आत्मा का सर्वश्रेष्ठ सृजन।

 

कविता-एक

कविता हलुआ नहीं हो सकती
कविता को कम से कम
रोटी जैसा तो होना ही चाहिए
कि कौर तोड़ते ही
उभर आएँ नुकीले कोने।

 

कविता- दो

प्यास से आकुल कोई चिड़िया
चिकनी चट्टानों की ढलानों पर से फिसलते
पानियों में चोंच मार देती है
कविता यूँ भी आकार लेती है।

 

जब कविता नहीं थी

क्या पानी तब भी
ऐसे ही लय में बरसता था
बारिश की शक्ल में
क्या तब भी नदियाँ
यूँ ही बहती थीं
चट्टानों पर मचलती-थिरकतीं
क्या पत्थरों के रंध्रों में
तब भी फूट आती थी घास
अनायास
क्या तब भी फूल खिलते थे
बिना यह देखे कि
कोई उन्हें देखता है कि नहीं
क्या तब भी पेड़ों की टहनियों पर
पक्षी चहचहाते थे
उड़ जाते थे स्वच्छंद आकाश में
जब कविता नहीं थी

जब कविता नहीं थी
क्या तब भी किसी के
छू देने भर से दिल धड़कता था
होंठ काँपते थे

क्या कोई ऐसा समय था
जब कविता नहीं थी ?

 

परवरिश

मैंने अपनी कविता को हमेशा
धूप, धूल और धुएँ से बचाया
कभी उसके सामने नहीं आने दिए
भूखे, नंगे, बदबू उगलते लोग
किसी मलिन बस्ती का साया भी
उस पर नहीं पड़ने दिया
कि कहीं सिद्धार्थ की तरह
विरक्त न हो जाए मेरी कविता
मेरी कविता ने नहीं धरे
किसी कँटीली पगडंडी पर पाँव
चाँदनी-सी गोरी, उजली कविता
उजले रेशमी वस्त्र पहन
बग्घी में बैठ भ्रमण करती रही
राजमार्गों और मनोहारी उद्यानों का
मैंने उसे राजकुमारी की तरह पाला
पर इतने लाड़-प्यार और ऐश्वर्य के होते भी
निरंतर पीली पड़ती जा रही है
मेरी राजकुमारी
मैं समझ नहीं पा रहा हूँ
कहाँ कमी रही उसकी परवरिश में।

 

ज्ञानेन्द्रियाँ

ईँधन की मानिंद भट्टियों में
झोंक दिए जाते हैं ज़िंदा इन्सान
तुम्हारी कविता को गंध नहीं आती

अंधेरे तक को कँपाती
गूँजती रहती हैं अबलाओं की चीख़ें
तुम्हारी कविता कुछ नहीं सुनती

भूख निरंतर मिटाती रहती है
हथेलियों की भाग्य और जीवन-रेखाएँ
तुम्हारी कविता कुछ नहीं देखती

शहर रोज़ लहू से तरबतर होता है
और तुम्हारी कविता के वस्त्र
उजले और बेदाग़ बने रहते हैं

कहाँ से लाते हो तुम
अपनी कविता की ज्ञानेन्द्रियाँ कवि ?

 

मायाजाल

मैं जानता हूँ
क़ब्र से ऊँचा नहीं है मेरा क़द
मेरे दोस्तो !
पर तुम मुझे हिमालय कहो
मैं जानता हूँ
किसी भी तर्क या विचार से
ज़्यादा असरदार है प्रचार
प्रचार की ताक़त से
रच दिए जा सकते हैं
ऐसे-ऐसे मायाजाल
कि जिनके धुंधलके में
विलीन हो जाएँ
तमाम तार्किक संरचनाएँ
मायाजाल रचना आता हो तो
टनों दूध पी जाती हैं पत्थर की मूर्तियाँ
जन्म से विकृत बच्चे देवता हो जाते हैं
लोगों को भेड़ों में बदल देते हैं धर्मगुरु
यही मायाजाल झूठ को स्थापित करता है
सच की तरह
सबसे बड़े सूरमा हो जाते हैं
अख़बारों में लड़ने वाले
काठ के योद्धा
कुछ भी संभव है इस मायावी देश में
मेरे दोस्तो !
तुम क़ब्र पर जमाते जाओ
प्रशंसा की मायावी बर्फ़ की परतें
एक दिन हिमालय हो जाएगी यह क़ब्र
और क़ब्र की आड़ में अदृश्य खड़ा होगा
सचमुच का हिमालय।

 

प्रेम के देश में

प्रेम के देश में
कभी साँझ नहीं होती
न रात
सुबह भी नहीं होती
प्रेम के देश में
प्रेम के देश में हमेशा
पौ फटने से पहले का उजास रहता है
और इस उजास में
अपनी धुन में मस्त
उड़ता फिरता है कोहरा।

 

तुम्हें बनाने में

मैंने देखा-
पहाड़ों पर बर्फ़ नहीं थी
ज्वालामुखियों में आग नहीं थी
न समुद्रों में नमक

मैं हैरान था-
पहाड़ों की बर्फ़ का क्या हुआ
ज्वालामुखियों की आग कहाँ गई
कहाँ ग़ायब हुआ समुद्रों का नमक

मैंने तुम्हें देखा और सोचा-
तुम्हें बनाने में कुदरत ने कितना कुछ गँवा दिया
पहली बार
मुझे कुदरत की
इस फ़िज़ूलख़र्ची पर गुस्सा नहीं आया।

 

गुलाबी उजाला

मेरे घर से मेरे प्यार तक
एक समंदर का फासला है
इस समंदर में अक्सर
तूफ़ानों की हलचल रहती है
समंदर भरा है
आक्टोपस और शार्क मछलियों से
जल में डूबी बगुले-सी खड़ी हैं
घात लगाए नुकीली चट्टानें
मैं रोज़ उस समंदर को
तैरकर पार करती हूँ
घर से जाते हुए
एक गुलाबी उजाला मेरे सामने होता है
घर लौटते हुए
मेरे भीतर होता है वही गुलाबी उजाला।

 

तुम्हारी आवाज़- एक

तुम कृष्ण की बाँसुरी तो नहीं
पर वैसी ही किसी बाँसुरी से
फूटती है तुम्हारी आवाज़
मैं राधा नहीं
पर तुम्हारी आवाज़ सुनते ही
तुम्हारी ओर दौड़ती है
कोई तरंग
तुम्हारी आवाज़ के कोहरे से
ढक जाता है मेरे भातर का आकाश
सूरज कहीं ठिठका रहता है
आसमान की आड़ में
इस तिलिस्म को देखता हुआ।

 

तुम्हारी आवाज़- दो

तुम्हारी आवाज़ का लोच
कभी मंथर, कभी द्रुत गति से
मचलता, बहता जल।

तुम्हारी आवाज़ का माधुर्य
पत्थर के आलिंगन से अभी-अभी छूटा
छलछलाता जल।
तुम्हारी आवाज़ का शिल्प
किनारे के पेड़ को देख ठिठक कर
हाथ हिलाता जल।

तुम्हारी आवाज़
एक हिमालयी नदी
कि जिसकी आर्द्रता
रिस जाती पोर-पोर में
तुमसे बात करता हूँ
तो लगता है
बात कर रहा हूँ ज़िंदा इन्सान से
परछाई से नहीं।

 

भाषा

तुमसे किस भाषा में बात करूँ
कि मैं जो कह रहा हूँ तुम वही सुनो, वही समझो
वही महसूस करो
अक्सर बात करते हुए
बातों में अनायास घुस आता है दिमाग़
और भाषा को चमकदार पर बेजान मोतियों में बदल देता है
मैं कहाँ से लाऊँ वह भाषा
जिस भाषा में मछली जल से बात करती है
बादल पौधों से
तारे सूरज से
झरना चट्टान से
झाड़ी रेत से
जिस भाषा में
चंद्रकांत मणि चाँद से बात करती है
भूखा शिशु माँ से

जिस दिन हम पा जायेंगे ऐसी भाषा
दुनिया में किसी भाषा की
ज़रूरत नहीं रह जाएगी।

 

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