इसलिए-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

इसलिए-आवाज़ों के घेरे -दुष्यंत कुमार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Dushyant Kumar

सहता रहा आतप
इसलिए हिमखंड
पिघले कभी
बनकर धार एक प्रचंड
जा भागीरथी में
लीन हो जाये ।

जीता रहा केवल
इसलिए मैं प्राण,
मेरी जिन्दगी है
एक भटका वाण
भेदे लक्ष्य
शाप-विहीन हो जाये ।

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