इन्सान हो तुम सीखो- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

इन्सान हो तुम सीखो- अंतर्द्वंद्व एखलाक ग़ाज़ीपुरी-एखलाक ग़ाज़ीपुरी -Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Akhlaque Gazipuri

अब झूठ उगलते हैं अख़बार जो होते हैं
बिकते हैं यहाँ पर बद किरदार जो होते हैं
डूबे हैं सरापा जो कीचड़ में गुनाहों की
अब देख लो मजहब के रखवार वो होते हैं
वो रोज मिटाते हैं यहाँ अम्नो अमान देखो
नफरत की हथेली में हथियार जो होते हैं
बनते हैं वही रहबर यहाँ आज जमाने के
मुश्किल से जमाने की बेज़ार जो होते हैं
बचना है तुम्हे इनसे तुम कल के मुहाफ़िज हो
बनो ऐसे गुलिस्ताँ तुम गुलज़ार जो होते हैं
इन्सान हो तुम सीखो जाकर के दरख़्तों से
झुकते हैं वही अक्सर फलदार जो होते हैं

Leave a Reply