इधर न देखो-ग़ुब्बार-ए-अय्याम -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

इधर न देखो-ग़ुब्बार-ए-अय्याम -फ़ैज़ अहमद फ़ैज़-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Faiz Ahmed Faiz

इधर न देखो कि जो बहादुर
कलम के या तेग़ के धनी थे
जो अज़मो-हिम्मत के मुद्दई थे
अब उनके हाथों में सिदक ईमां की
आज़मूदा पुरानी तलवार मुड़ गई है
जो कजकुलह साहबे-चशम थे
जो अहले-दसतार मुहतरम थे
हविस के परपेंच रासतों में
कुलह किसी ने गिरो रख दी
किसी ने दसतार बेच दी है
उधर भी देखो
जो अपने रख़्शां लहू के दीनार
मुफ़त बाज़ार में लुटाकर
नज़र से ओझल हुए
और अपनी लहद में इस वकत तक ग़नीं हैं
उधर भी देखो
जो सिरफ़ हक की सलीब पर अपना तन सजाकर
जहां से रुख़्सत हुए
और अहले-जहां में इस वकत तक बनी हैं

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