इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya part 2

इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya part 2

 भादों की उमस

सहम कर थम से गए हैं बोल बुलबुल के,
मुग्ध, अनझिप रह गए हैं नेत्र पाटल के,
उमस में बेकल, अचल हैं पात चलदल के,
नियति मानों बँध गई है व्यास में पल के ।

लास्य कर कौंधी तड़ित् उर पार बादल के,
वेदना के दो उपेक्षित वीर-कण ढलके
प्रश्न जागा निम्नतर स्तर बेध हृत्तल के—
छा गए कैसे अजाने, सहपथिक कल के?

दिल्ली, 3 अगस्त, 1941

गोप गीत

नीला नभ, छितराये बादल, दूर कहीं निर्झर का मर्मर
चीड़ों की ऊध्र्वंग भुजाएँ भटका-सा पड़कुलिया का स्वर,
संगी एक पार्वती बाला, आगे पर्वत की पगडंडी:
इस अबाध में मैं होऊँ बस बढ़ते ही जाने का बन्दी!

1936

वीर-बहू

एक दिन देवदारु-वन बीच छनी हुई
किरणों के जाल में से साथ तेरे घूमा था।
फेनिल प्रपात पर छाये इन्द्र-धनु की
फुहार तले मोर-सा प्रमत्त-मन झूमा था
बालुका में अँकी-सी रहस्यमयी वीर-बहू
पूछती है रव-हीन मखमली स्वर से:
याद है क्या, ओट में बुरूँस की प्रथम बार
धन मेरे, मैं ने जब ओठ तेरा चूमा था?

शिलङ्, मार्च, 1944

मेरी थकी हुई आँखों को

मेरी थकी हुई आँखों को किसी ओर तो ज्योति दिखा दो-
कुज्झटिका के किसी रन्ध्र से ही लघु रूप-किरण चमका दो।
अनचीती ही रहे बाँसुरी, साँस फूँक दो चाहे उन्मन-
मेरे सूखे प्राण-दीप में एक बूँद तो रस बरसा दो!

दिल्ली, 5 मार्च, 1943

विपर्यास

तेरी आँखों में पर्वत की झीलों का नि:सीम प्रसार
मेरी आँखों बसा नगर की गली-गली का हाहाकार,
तेरे उर में वन्य अनिल-सी स्नेह-अलस भोली बातें
मेरे उर में जनाकीर्ण मग की सूनी-सूनी रातें!

लाहौर, 19 सितम्बर, 1935

जब-जब पीड़ा मन में उमँगी

जब-जब पीड़ा मन में उमँगी तुमने मेरा स्वर छीन लिया
मेरी नि:शब्द विवशता में झरता आँसू-कन बीन लिया।
प्रतिभा दी थी जीवन-प्रसून से सौरभ-संचय करने की-
क्यों सार निवेदन का मेरे कहने से पहले छीन लिया?

मेरठ, 31 मार्च, 1941

बदली की साँझ

धुँधली है साँझ किन्तु अतिशय मोहमयी,
बदली है छायी, कहीं तारा नहीं दीखता।
खिन्न हूँ कि मेरी नैन-सरसी से झाँकता-सा
प्रतिबिम्ब, प्रेयस! तुम्हारा नहीं दीखता।

माँगने को भूल कर बोध ही में डूब जाना
भिक्षुक स्वभाव क्यों हमारा नहीं सीखता?

शिलङ्, 28 फरवरी, 1944

वर्ग-भावना-सटीक

अवतंसों का वर्ग हमारा: खड्ïगधार भी, न्यायकार भी।
हम ने क्षुद्र, तुच्छतम जन से
अनायास ही बाँट लिया श्रम-भार भी, सुख-भार भी।
बल्कि गये हम आगे भी-हम निश्चल ही हैं उदार भी।

टीका-(यद्यपि भाष्यकार है दुर्मुख
हम लोगों का एकमात्र श्रम है-सुरति-श्रम
उस अन्त्यज का एकमात्र सुख है-मैथुन-सुख।

दिल्ली, 11 फरवरी, 1941

रजनीगंधा मेरा मानस

रजनीगन्धा मेरा मानस!
पा इन्दु-किरण का नेह-परस, छलकाता अन्तस् में स्मृति-रस|
उत्फुल्ल, खिले इह से बरबस, जागा पराग, तन्द्रिल, सालस,
मधु से बस गयीं दिशाएँ दस, हर्षित मेरा जीवन-सुमनस्-

लो, पुलक उठी मेरी नस-नस जब स्निग्ध किरण-कण पड़े बरस!
तुम से सार्थक मेरी रजनी, पावस-रजनी से पुण्य-दिवस;
तू सुधा-सरस, तू दिव्य-दरस, तू पुण्य-परस मेरा सुधांशु-
इस अलस दिशा में चला विकस-रजनीगन्धा मेरा मानस!

1939

क्षण भर सम्मोहन छा जावे!

क्षण-भर सम्मोहन छा जावे!
क्षण-भर स्तम्भित हो जावे यह अधुनातन जीवन का संकुल-
ज्ञान-रूढि़ की अनमिट लीकें, ह्रत्पट से पल-भर जावें धुल,
मेरा यह आन्दोलित मानस, एक निमिष निश्चल हो जावे!

मेरा ध्यान अकम्पित है, मैं क्षण में छवि कर लूँगा अंकित,
स्तब्ध हृदय फिर नाम-प्रणय से होगा दु:सह गति से स्पन्दित!
एक निमिष-भर, बस! फिर विधि का घन प्रलयंकर बरसा आवे
क्रूर काल-कर का कराल शर मुझ को तेरे वर-सा आवे!
क्षण-भर सम्मोहन छा जावे!

अजमेर, 4 नवम्बर, 1940

 

निमीलन

निशा के बाद उषा है, किन्तु देख बुझता रवि का आलोक
अकारण हो कर जैसे मौन ज्योति को देते विदा सशोक
तुम्हारी मीलित आँखें देख किसी स्वप्निल निद्रा में लीन
हृदय जाने क्यों सहसा हुआ आद्र्र, कम्पित-सा, कातर, दीन!

गुरदासपुर (रेल में), 1 सितम्बर, 1935

किस ने देखा चाँद

किस ने देखा चाँद?-किस ने, जिसे न दीखा उस में क्रमश: विकसित
एकमात्र वह स्मित-मुख जो है अलग-अलग प्रत्येक के लिए
किन्तु अन्तत: है अभिन्न:
है अभिन्न, निष्कम्प, अनिर्वच, अनभिवद्य,
है युगातीत, एकाकी, एकमात्र?

दिल्ली, 1942

 

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