इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya part 1

इत्यलम् अज्ञेय-सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Sachchidananda Hirananda Vatsyayan Agyeya part 1

ध्रुव

मानव की अन्धी आशा के दीप! अतीन्द्रिय तारे!
आलोक-स्तम्भ सा स्थावर तू खड़ा भवाब्धि किनारे!
किस अकथ कल्प से मानव तेरी धु्रवता को गाते:
हो प्रार्थी प्रत्याशी वे उसको हैं शीश नवाते।

वे भूल-भूल जाते हैं जीवन का जीवन-स्पन्दन:
तुझ में है स्थिर कुछ तो है तेरा यह अस्थिर कम्पन!

डलहौजी, 14 मार्च, 1934

 राखी

मेरे प्राण स्वयं राखी-से प्रतिक्षण तुझको रहते घेरे
पर उनके ही संरक्षक हैं अथक स्नेह के बन्धन तेरे।
भूल गये हम कौन कौन है, कौन किसे भेजे अब राखी-
अपनी अचिर अभिन्न एकता की बस यही भूल हो साखी!

लाहौर, 29 मार्च, 1935

प्रेरणा

जब-जब थके हुए हाथों से छूट लेखनी गिर जाती है
‘सूखा उर का रस-स्रोत’ यह शंका मन में फिर जाती है,
तभी, देवि, क्यों सहसा दीख, झपक, छिप जाता तेरा स्मित-मुख-
कविता की सजीव रेखा-सी मानस-पट पर तिर आती है?

डलहौजी, 14 सितम्बर, 1934

जीवन-दान

मुक्त बन्दी के प्राण!
पैरें की गति शृंखल बाधित, काया कारा-कलुषाच्छादित
पर किस विकल प्रेरणा-स्पन्दित उद्धत उस का गान!
अंग-अंग उस का क्षत-विह्वल हृदय हताशाओं से घायल,

किन्तु असह्य रणातुर उस की आत्मा का आह्वान!
उस की भूख-प्यास भी नियमित उस की अन्तिम सम्पत्ति परिहृत
लज्जित पर बलिदान देख कर उस का जीवन-दान!
मुक्त बन्दी के प्राण!

डलहौजी, 1934

विशाल जीवन

है यदि तेरा हृदय विशाल, विराट् प्रणय का इच्छुक क्यों?
है यदि प्रणय अतल, तो अपनी अतल-पूर्ति का भिक्षुक क्यों?
दावानल की काल-ज्वाल जलती-बुझती एकाकी ही-
जीवन हो यदि ऊँचा तो ऊँची समाधि हो रक्षक क्यों?

मुलतान जेल, 5 दिसम्बर, 1933

विश्वास

तुम्हारा यह उद्धत विद्रोही
घिरा हुआ है जग से पर है सदा अलग, निर्मोही!
जीवन-सागर हहर-हहर कर उसे लीलने आता दुर्धर
पर वह बढ़ता ही जाएगा लहरों पर आरोही!

जगती का अविरल कोलाहल कर न सकेगा उस को बेकल
ओ आलोक! नयन उस के अनिमिष लखते तुम को ही।
कैसे खोएगा वह पथ को तुम्हीं एक जब पथ-दर्शक हो
एक साँकरा मग है, और अकेला एक बटोही!
तुम्हारा यह उद्धत विद्रोही!

लाहौर, 8 मई, 1935

द चाइल्ड इज द फ़ादर आफ़ द मैन

तरुण अरुण तो नवल प्रात में ही दिखलाई पड़ता लाल-
इसीलिए मध्याह्न में अवनि को झुलसाती उसकी ज्वाल!
मानव किन्तु तरुण शिशु को ही दबना-झुकना सिखला कर
आशा करते हैं कि युवक का ऊँचा उठा रहेगा भाल!

लाहौर, 4 अप्रैल, 1934

 

प्राण तुम्हारी पद-रज फूली

प्राण, तुम्हारी पद-रज फूली
मुझ को कंचन हुई तुम्हारे चंल चरणों की यह धूली।
आयी थी तो जाना भी था, फिर भी आओगी, दुख किस का?
एक बार जब दृष्टि-करों रसे पद-चिह्नों की रेखा छू ली।

वाक्य अर्थ का हो प्रत्याशी, गीत शब्द का कब अभिलाषी?
अन्तर में पराग-सी छायी है स्मृतियों की आशा-धूली।
प्राण, तुम्हारी पद-रज फूली।

1935

 

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