इज़ारबन्द (कमरबन्द)-नारी श्रृंगार-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

इज़ारबन्द (कमरबन्द)-नारी श्रृंगार-नज़ीर अकबराबादी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Nazeer Akbarabadi

छोटा बड़ा न कम, न मंझौला इज़ार बंद।
है उस परी का सबसे अमोला अज़ार बंद॥
हर एक क़दम पे शोख़ के ज़ानू के दरमियां।
खाता है किस झलक से झकोला इज़ार बंद॥
गोटा, किनारी, बादला, मुक़्के़श के सिवा।
थे चार तोले मोती, जो तोला इज़ार बंद॥
हंसने में हाथ मेरा कहीं लग गया तो वह।
लौंडी से बोली “जा मेरा धोला इज़ार बंद”॥
“और धो नहीं, तो फेंक दे, नापाक हो गया”।
वह दूसरा जो है, सो पिरो ला इज़ार बंद॥
एक दिन कहा यह मैंने कि ऐ जान, आपका।
हमने कभी मजे़ में न खोला इज़ार बंद॥
सुनकर लगी यह कहने कि “ऐ वा छड़े च खु़श”।
ऐसा भी क्या मैं रखती हूं पोला “इज़ार बंद”॥
आ जावे इस तरह से जो अब हर किसी के हाथ।
वैसा तो कुछ नहीं मेरा भोला इज़ार बंद॥
एक रात मेरे साथ वह अय्यार, मक्रबाज़।
लेटी छुपा के अपना ममोला इज़ार बंद॥
जब सो गई तो मैंने भी दहशत से उसकी आ।
पहले तो चुपके चुपके टटोला इज़ार बंद॥
आखि़र बड़ी तलाश से उस शोख़ का “नज़ीर”।
जब आधी रात गुज़री तो खोला इज़ार बंद॥

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