इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि -शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि -शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

 

इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि ॥
किउ दरगह पति पाईऐ जा हरि न वसै मन माहि ॥
गुरि मिलिऐ सुखु पाईऐ अगनि मरै गुण माहि ॥१॥
मन रे अहिनिसि हरि गुण सारि ॥
जिन खिनु पलु नामु न वीसरै ते जन विरले संसारि ॥१॥ रहाउ ॥
जोती जोति मिलाईऐ सुरती सुरति संजोगु ॥
हिंसा हउमै गतु गए नाही सहसा सोगु ॥
गुरमुखि जिसु हरि मनि वसै तिसु मेले गुरु संजोगु ॥२॥
काइआ कामणि जे करी भोगे भोगणहारु ॥
तिसु सिउ नेहु न कीजई जो दीसै चलणहारु ॥
गुरमुखि रवहि सोहागणी सो प्रभु सेज भतारु ॥३॥
चारे अगनि निवारि मरु गुरमुखि हरि जलु पाइ ॥
अंतरि कमलु प्रगासिआ अम्रितु भरिआ अघाइ ॥
नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥४॥२०॥(21)॥

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