इंक़लाब अपना काम करके रहा-ग़ज़लें -अहमद नदीम क़ासमी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmad Nadeem Qasmi,

इंक़लाब अपना काम करके रहा-ग़ज़लें -अहमद नदीम क़ासमी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Ahmad Nadeem Qasmi,

इंक़लाब अपना काम करके रहा
इंक़लाब अपना काम करके रहा
बादलों में भी चांद उभर के रहा

है तिरी जुस्तजू गवाह, कि तू
उम्र-भर सामने नज़र के रहा

रात भारी सही कटेगी जरूर
दिन कड़ा था मगर गुज़र के रहा

गुल खिले आहनी हिसारों के
ये त’ आत्तर मगर बिखर के रहा

अर्श की ख़िलवतों से घबरा कर
आदमी फ़र्श पर उतर के रहा

हम छुपाते फिरे दिलों में चमन
वक़्त फूलों में पाँव धर के रहा

मोतियों से कि रेगे-साहिल से
अपना दामन ‘नदीम’ भर के रहा

इंक़लाब अपना काम करके रहा
बादलों में भी चांद उभर के रहा

है तिरी जुस्तजू गवाह, कि तू
उम्र-भर सामने नज़र के रहा

रात भारी सही कटेगी जरूर
दिन कड़ा था मगर गुज़र के रहा

गुल खिले आहनी हिसारों के
ये त’ आत्तर मगर बिखर के रहा

अर्श की ख़िलवतों से घबरा कर
आदमी फ़र्श पर उतर के रहा

हम छुपाते फिरे दिलों में चमन
वक़्त फूलों में पाँव धर के रहा

मोतियों से कि रेगे-साहिल से
अपना दामन ‘नदीम’ भर के रहा

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