आ गई प्रभात फेरी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

आ गई प्रभात फेरी-गुरभजन गिल-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gurbhajan Gill

 

नींद खुली है
पटाखे चल रहे हैं
शबद पवित्र गैरहाज़िर
सुन लो क्या कह रहा है।

न कहीं वह सहजता
न धुनकार ही है।
आकाश में कडुवा धुँआ
जल भी गंदला-सा
धरती पर कृतघ्नता भार है।

मेरा मन ननकाने*-सा।
बहुत अकेला
सोचकर बड़ा उदास है!

मेरा बाबा¹ रोज़ मुझसे पूछता है।
मैंने तेरे कर्तारपुर में
ध्यान के ख़ातिर शबद पवित्र बोया था
यह भला कौन सी फ़सल है।

मन के नाचते मोर की जगह
शोर वाली
भटकती फिरती है आज भी आत्मा
मन में
काली घटा घनघारे वाली।

साज़ और आवाज़ यही बोलते हैं
लौट आ बाबा गुरु तू लौट आ।
मैंने तो अपना स्व सारा
शबद में ढाला था।
काली अँधेरी रात थी
जब शिखर पर
सूरज-सा सच्चा शबद
पक्राशवान दीवा बाला था।

सफ़र पर चढ़े निरंतर
सिद्ध जोगी नाथ सारे कनफटे
जो चढ़े ऊँची पहाड़ी
ज्ञान के बड़े धुरंधर!
धरती पर उतारे ज़िंदगी में
अमल की राह पर डाले
मैं भला कहाँ गया हूँ।

शबद में मैं ही हूँ हाज़िर
मन के काले खोट वालों को
बहुत गाढ़ा लिख कहा था!
तीरथ में स्नान करते
मन की मैल उतारो।
जग जीतने के लिए
मन के भीतर झाँको
गोष्ठियों के दौरान मैंने तो
वृत्तियों के जंगली
जो धरती की ओर मोड़े।
फिर अब लगते भगोड़े।
सुख सहूलियत वाले जंगल की ओर
सरपट दौड़े।

मैं तो नित्य प्रभात वेला
राग आशा का गान करता हूँ!
फिर मुझे ही आवाज़ लगाते हो!
यह भला किसको यह इस तरह चराते हो?

*गुरु नानक का जन्म स्थल।
¹ गुरु नानक

 

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