आह!-पुखराज-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar 

आह!-पुखराज-गुलज़ार-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Gulzar

ठंडी साँसे ना पालो सीने में
लम्बी सांसों में सांप रहते हैं
ऐसे ही एक सांस ने इक बार
डस लिया था हसी क्लियोपेत्रा को

मेरे होटों पे अपने लब रखकर
फूँक दो सारी साँसों को ‘बीबा’

मुझको आदत है ज़हर पीने की

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