आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह-शब्द -गुरु नानक देव जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Nanak Dev Ji

आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥
मिलि कै करह कहाणीआ सम्रथ कंत कीआह ॥
साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥१॥
करता सभु को तेरै जोरि ॥
एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥१॥ रहाउ ॥
जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणीं ॥
सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥
पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥२॥
केतीआ तेरीआ कुदरती केवड तेरी दाति ॥
केते तेरे जीअ जंत सिफति करहि दिनु राति ॥
केते तेरे रूप रंग केते जाति अजाति ॥३॥
सचु मिलै सचु ऊपजै सच महि साचि समाइ ॥
सुरति होवै पति ऊगवै गुरबचनी भउ खाइ ॥
नानक सचा पातिसाहु आपे लए मिलाइ ॥४॥१०॥(17)॥

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