आल्हा छंद (आलस्य)-मात्रिक छंदों की कविताएँ-बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Basudev Agarwal Naman

आल्हा छंद (आलस्य)-मात्रिक छंदों की कविताएँ-बासुदेव अग्रवाल ‘नमन’-Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Basudev Agarwal Naman

 

कल पे काम कभी मत छोड़ो, आता नहीं कभी वह काल।
आगे कभी नहीं बढ़ पाते, देते रोज काम जो टाल।।
किले बनाते रोज हवाई, व्यर्थ सोच में हो कर लीन।
मोल समय का नहिं पहचाने, महा आलसी प्राणी दीन।।

बोझ बने जीवन को ढोते, तोड़े खटिया बैठ अकाज।
कार्य-काल को व्यर्थ गँवाते, मन में रखे न शंका लाज।
नहीं भरोसा खुद पे रखते, देते सदा भाग्य को दोष,
कभी नहीं पाते ऐसे नर, जीवन का सच्चा सन्तोष।।

आलस ऐसा शत्रु भयानक, जो जर्जर कर देता देह।
मान प्रतिष्ठा क्षीण करे यह, अरु उजाड़ देता है गेह।।
इस रिपु से जो नहीं चेतते, बनें हँसी के जग में पात्र।
बन कर रह जाते हैं वे नर, इसके एक खिलौना मात्र।।

कुकड़ू कूँ से कुक्कुट प्रतिदिन, देता ये पावन संदेश।
भोर हुई है शय्या त्यागो, कर्म-क्षेत्र में करो प्रवेश।।
चिड़िया चहक चहक ये कहती, गौ भी कहे यही रंभाय।
वातायन से छन कर आती, प्रात-प्रभा भी यही सुनाय।।

पर आलस का मारा मानस, इन सब से रह कर अनजान।
बिस्तर पे ही पड़ा पड़ा वह, दिन का कर देता अवसान।।
ऊहापोह भरी मन स्थिति के, घोड़े दौड़ा बिना लगाम।
नये बहाने नित्य गढ़े वह, टालें कैसे दैनिक काम।।

मानव की हर प्रगति-राह में, खींचे आलस उसके पाँव।
अकर्मण्य रूखे जीवन पर, सुख की पड़ने दे नहिं छाँव।।
कार्य-क्षेत्र में नहिं बढ़ने दे, हर लेता जो भी है पास।
घोर व्यसन यह तन मन का जो, जीवन में भर देता त्रास।।
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आल्हा छंद विधान / वीर छंद विधान –

आल्हा छंद वीर छंद के नाम से भी प्रसिद्ध है जो
31 मात्रा प्रति पद का सम पद मात्रिक
छंद है। यह चार पदों में रचा जाता है।
इसे मात्रिक सवैया भी कहते हैं। इसमें
यति16 और 15 मात्रा पर नियत होती है।
दो दो या चारों पद समतुकांत होने चाहिए।

16 मात्रा वाले चरण का विधान और मात्रा
बाँट ठीक चौपाई छंद वाली है। 15 मात्रिक
चरण का अंत ताल यानी गुरु लघु से होना
आवश्यक है। तथा बची हुई 12 मात्राएँ
तीन चौकल के रूप में हो सकती हैं या
फिर एक अठकल और एक चौकल हो
सकती हैं। चौकल और अठकल के सभी
नियम लागू होंगे।

’यथा नाम तथा गुण’ की उक्ति को चरितार्थ
करते आल्हा छंद या वीर छंद के कथ्य
अक्सर ओज भरे होते हैं और सुनने वाले
के मन में उत्साह और उत्तेजना पैदा करते
हैं। जनश्रुति इस छंद की विधा को यों
रेखांकित करती है –

“आल्हा मात्रिक छंद, सवैया, सोलह-पन्द्रह यति अनिवार्य।
गुरु-लघु चरण अन्त में रखिये, सिर्फ वीरता हो स्वीकार्य।
अलंकार अतिशयताकारक, करे राइ को तुरत पहाड़।
ज्यों मिमयाती बकरी सोचे, गुँजा रही वन लगा दहाड़।”

परन्तु इसका यह अर्थ भी नहीं कि इस छंद
में वीर रस के अलावा अन्य रस की रचना
नहीं रची जा सकती।

 

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