आरज़ू के मुसाफ़र-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar 

आरज़ू के मुसाफ़र-लावा -जावेद अख़्तर-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Javed Akhtar

जाने किसकी तलाश उनकी आँखों में थी
आरज़ू के मुसाफ़र
भटकते रहे
जितना भी वो चले
उतने ही बिछ गए
राह में फ़ासले
ख्वाब मंज़ल थे
और मंज़लें ख्वाब थीं
रास्तों से निकलते रहे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

जिनपे सब चलते हैं
ऐसे सब रास्ते छोड़के
एक अंजान पगडंडी की उंगली थामे हुए
इक सितारे से
उम्मीद बाँधे हुए सम्त की
हर गुमाँ को यक़ीं मानके
अपने दिल से
कोई धोखा खाते हुए जानके
सह्रा-सह्रा
समुंदर को वो ढ़ूंढते
कुछ सराबों की जानिब
रहे गामज़न
यूँ नहीं था
कि उनको ख़बर ही न थी
ये समुंदर नहीं
लेकिन उनको कहीं
शायद एहसास था
ये फ़रेब
उनको महवे-सफ़र रक्खेगा
ये सबब था
कि था और कोई सबब
जो लिए उनको फिरता रहा
मंज़िलों-मंज़िलों
रास्ते-रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

अक्सर ऐसा हुआ
शहर-दर-शहर
और बस्ती-बस्ती
किसी भी दरीचे में
कोई चिराग़े-मुहब्बत न था
बेरुख़ी से भरी
सारी गलियों में
सारे मकानों के
दरवाज़े यूँ बंद थे
जैसे इक सर्द
ख़ामोश लहजे में
वो कह रहे हों
मुरव्वत का और मेहरबानी का मस्कन
कहीं और होगा
यहाँ तो नहीं है
यही एक मंज़र समेटे थे
शहरों के पथरीले सब रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

और कभी यूँ हुआ
आरज़ू के मुसाफ़र थे
जलती-सुलगती हुई धूप में
कुछ दरख़्तों ने साये बिछाए मगर
उनको ऐसा लगा
साये में जो सुकून
और आराम है
मंज़लों तक पहुँचने न देगा उन्हें
और यूँ भी हुआ
महकी कलियों ने ख़ुश्बू के पैग़ाम भेजे उन्हें
उनको ऐसा लगा
चंद कलियों पे कैसे क़नाअत करें
उनको तो ढूँढना है
वो गुलशन कि जिसको
किसी ने अभी तक है देखा नहीं
जाने क्यों था उन्हें इसका पूरा यक़ीं
देर हो या सवेर उनको लेकिन कहीं
ऐसे गुलशन के मिल जाएंगे रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

धूप ढलने लगी
बस ज़रा देर में रात हो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़र जो हैं
उनके क़दमों तले
जो भी इक राह है
वो भी शायद अँधेरे में खो जाएगी
आरज़ू के मुसाफ़िर भी
अपने थके-हारे बेजान पैरों पे
कुछ देर तक लड़खड़ाएंगे
और गिरके सो जाएंगे
सिर्फ़ सन्नाटा सोचेगा ये रातभर
मंज़लें तो इन्हें जाने कितनी मिलीं
ये मगर
मंज़लों को समझते रहे जाने क्यों रास्ते
जाने किस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे

और फिर इक सवेरे की उजली किरन
तीरगी चीर के
जगमगा देगी
जब अनगिनत रहगुज़ारों पे बिखरे हुए
उनके नक़्शे-क़दम
ज़िआफ़यतगाहों में रहनेवाले
ये हैरत से मजबूर होके कहेंगे
ये नक़्शे-क़दम सिर्फ़ नक़्शे-क़दम ही नहीं
ये तो दरयाफ़्त हैं
ये तो ईजाद हैं
ये तो अफ़्कार हैं
ये तो अश्आर हैं
ये कोई रक़्स हैं
ये कोई राग हैं
इनसे ही तो हैं आरास्ता
सारी तहज़ीबो-तारीख़ के
वक़्त के
ज़िंदगी के सभी रास्ते

वो मुसाफ़र मगर
जानते-बूझते भी रहे बेख़बर
जिसको छू लें क़दम
वो तो बस राह थी
उनकी मंज़ल दिगर थी
अलग चाह थी
जो नहीं मिल सके उसकी थी आरज़ू
जो नहीं है कहीं उसकी थी जुस्तुजू
शायद इस वास्ते
आरज़ू के मुसाफ़र भटकते रहे।

 

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