आयुष्य जो अवशिष्ट रहा- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

आयुष्य जो अवशिष्ट रहा- राजेन्द्र केशवलाल शाह -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Rajendra Keshavlal Shah

 

घर की ओर

खड़खड़ाती लँगड़ाती जाती लढ़िया
पुरानी घने अन्धकार में, विजन पथ की लीक पर
दृगों में अंजन स्वप्न-मधुर निद्रा का
भरते मीठी झंकार से, घुँघुरू बैल के।

हल्के समीर में घुलती ठण्डक चरम प्रहर में।
मुझे व्यापते स्मृतिदुःख-सी फैल जाती सब कहीं
सुप्त सीमा को लघुदीप की देख होते सजग
पुनः ओढ़ तम को, बदल लेती करवट

उझकते पथ-तरु-नीड़ से पक्षी कहीं
या कभी टूटता कोई तारा
बूझता बस इतना ही, गहन मन से वहाँ भी इन्द्रियाँ तमाम
रह जाती निहारती, कण-कण में इस मिट्टी के

पाता झलक जन्म-स्थान की आयु की अवधि में
भरा था जब घर उसकी स्मृति में घूमता सूने घर में।

प्रवेश

भरा पूरा था घर, उसके सूने रजोमय प्रांगण में रख
छोटी-सी गठरी आयु के अवशेष की
कि उभरी गगन में तभी रक्तिम रेख कुहर-छाये
विषण्ण उजास की जागी अनुकम्पन में दिशाएँ

हालचाल पूछते, बड़े-बूढ़े जो थे बचे थोड़े-से
नजर डाल बहुएँ पुनः जुट जाती काम में अपने
आ घेरा कुतूहल-प्रेरित शिशुओं ने सारे,
पल भर भौंक, सँघ लिये चरण मेरे श्वान ने

मुँह-से खुले ताले, द्वारों ने किया क्रन्दन तनिक-सा
अचल स्थिति में थे जड़ीभूत गात्र;
मौका पाते ही दौड़ पड़ी भीतर की भीगी, बासी हवा
पाया हो मानो किसी प्रेत ने उन्मोचन!

पैर धरते ही घर में, समेट ली तहें अँधेरे ने
किरण-स्पर्श में देखा पुनः पुराने पात्रों को!

 स्वजनों की स्मृति

दीवार पर झुकी-सी खड़ी जीर्ण-शीर्ण खटिया अब भी
रात ढले बिछाकर जिसे, सुनाते पिताजी
जीवन बलदायी, रस-भरी कथाएँ पुराण की
घरेलू नेह से बौराया सारा शहर प्रकोष्ठ में

मुदित मुख माँ का, स्वरों से उसके गूंजता घर
नित्य ही परोसती वह अमिय अपने बिलौने का,
सुरभि थी वहाँ, इच्छाएँ थीं फलती सभी की
झूलता अब यहाँ खाली छींका दधिहीन झूरता।

ऊपर यहाँ बरसाती यह कैसी बिलखती
उमगते दो हृदयों का प्रिय, हुआ था संगम कभी
पूर्णिमा की रात उमड़े थे वे ज्वार-से
गगन को समेटती जाली अब अन्धी, जालों से।

गिरिसर का-सा, बहाता यह हंस ध्वनियों को
झींगुर भी जहाँ न बोल पाता आज, गूंगी व्यथा से।

परिवर्तन

शिशु-हृदय के-से उल्लास से खड़ा निकट झरोखे के
निहारता लीक को, दृष्टि की गति बंकिम
खेलता-छिपता पल-पल, जाता अनन्त सृष्टि में
छोड़ जाता पीछे भ्रमण को विमुग्ध मुझको।

आतुर कितना हृदय विहार को! सुदूर के
अगम पथ पर,
अपूर्ण कथा के कुहर पर होती अंकित
रंगारंग कल्पना मेरी,
निहारते स्वयं रचित आनन्द में दुग भवितव्य को।

अभी भी वही झरोखा, वही मैं और यह पथ
आ घेरती चौगिर्द, स्मृतियाँ बीते दिनों की :
मूक हो चुकी बीन, सुनता फिर भी झंकार
विविध समयों के स्वर समग्र मिलते वृन्द में।

सरल मन की चंचलताओं का नहीं अब कोई क्रीड़न :
हृदय के शून्य में प्राप्त अब निमज्जन प्रशान्त।

 जीवन विलय

देखता अब स्वयं को विलीन होते हृदय के शून्य में :
नहीं अब कोई संकल्प, न इच्छाएँ,
फिर भी मेरे कर्मों की वह प्रफुल्लित सृष्टि
चारों दिशाओं से गूंजती आद्यन्त जय जीवन की

उपजा शब्द जैसा होता शमित भी वैसे ही
असीमित जगत् में व्याप्त होती उसकी अनन्त प्रतिध्वनि;
नहींवत् हो रहता मिट्टी में, फिर भी तरुपर्णों पर
कैसी खेलतीं शत शत एषणाएँ बीज की!

तनिक दूरी से करता दर्शन यहाँ जीवन का,
उदय या अन्त को भी किसी के न देखता
रूप-रमणा में देखता किसी तत्त्व चिरन्तन को
निज आनन्द में रहना पाकर परिवर्तन।

गहन निधि मैं, लहर भी मैं और घनवर्षा भी,
अभिनव रूपों में पाता मैं सदा ही विसर्जन।

-रूपान्तर : ज्योत्स्ना मिलन

 

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