आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ-शब्द-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji

आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ-शब्द-गुरू अमर दास जी-Hindi Poetry-हिंदी कविता -Hindi Poem | Hindi Kavita Guru Amar Das Ji

आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥
जो तेरी सदा सरणाई तिन मनि दुखु न होई ॥१॥
जुगि जुगि भगता की रखदा आइआ ॥
दैत पुत्रु प्रहलादु गाइत्री तरपणु किछू न जाणै सबदे मेलि मिलाइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनदिनु भगति करहि दिन राती दुबिधा सबदे खोई ॥
सदा निरमल है जो सचि राते सचु वसिआ मनि सोई ॥२॥
मूरख दुबिधा पड़्हहि मूलु न पछाणहि बिरथा जनमु गवाइआ ॥
संत जना की निंदा करहि दुसटु दैतु चिड़ाइआ ॥३॥
प्रहलादु दुबिधा न पड़ै हरि नामु न छोडै डरै न किसै दा डराइआ ॥
संत जना का हरि जीउ राखा दैतै कालु नेड़ा आइआ ॥४॥
आपणी पैज आपे राखै भगतां देइ वडिआई ॥
नानक हरणाखसु नखी बिदारिआ अंधै दर की खबरि न पाई ॥੫॥੧੧॥੨੧॥੧੧੩੩॥

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