आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 1

समर्पण

परम पूज्य पिताजी
श्री खमानी सिंह जी
को
सादर समर्पित

अपनी बात

हिन्दी काव्य रूपों में ‘मुकरी’ का अपना महत्व है। मुकरी बहुत ही पुरातन एवं विरल काव्य विद्या है। मुकरी को कह-मुकरी के नाम से भी जाना जाता है। कह-मुकरी अर्थात् कहकर मुकर जाना।

अधिकांश विद्वान मुकरी को पहेली का ही एक प्रकार मानते है। पहेली की ही तरह मुकरी भी श्रोता के बुद्धि विकास के साथ उसका मनोरंजन करती है। पुरातन मुकरियाँ देखने पर स्वतः स्पष्ट होता है कि मुकरी दो अंतरंग सखियों के बीच हुआ संवाद है, जिसमें पहली सखी अपनी दूसरी सखी के सामने अपनी बात कुछ इस प्रकार रखती है कि उसे अर्थ-भ्रम हो जाता है। श्रोता सखी ज्यों ही अर्थ-ग्रहण करना चाहती है, त्यों ही वक्ता सखी दूसरा अर्थ करके उसे हतप्रभ कर देती है। यद्यपि यह दो पुरुष मित्रों या स्त्री-पुरुष का संवाद भी हो सकता है।

मुकरी या कह मुकरी चार पदों का सममात्रिक छंद है। मुकरी के प्रत्येक पद या चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं। इस प्रकार एक आदर्श मुकरी में कुल 64 मात्राएँ होती हैं। प्रत्येक चरण में 8वीं मात्रा पर यति होना उत्तम माना गया है। हालांकि कई मुकरीकारों ने अपवादस्वरूप उक्त विधान से इतर भी मुकरियाँ लिखी हैं किन्तु मुकरी में अपनी बात से मुकरने या नटने का भाव निहित होता है।

मुकरी ऐसी काव्य संरचना है, जिसमें प्रारम्भिक तीन चरणों में पहेली की तरह ‘बूझो तो जानें’ वाली बात छिपी होती है, जबकि अंतिम चरण में इसके दो उत्तर निहित होते हैं। मुकरी की विशेषता है कि इसमें श्रोता के पहले उत्तर से असहमति जताते हुए वक्ता द्वारा दूसरा उत्तर प्रस्तुत कर उसे सही ठहराया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि हिन्दी साहित्य में मुकरी की परम्परा की शुरूआत अमीर खुसरो से होती है। मुकरीकारों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने नये जमाने की मुकरियाँ लिखीं। राजनैतिक मुकरियाँ भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का अभिनव प्रयोग हैं।

नागार्जुन ने भी परम्परागत विषयों से हटकर मुकरियाँ लिखीं हैं। अपने छात्र जीवन में मैंने कुछ मुकरियाँ पढ़ी जरूर थीं किन्तु मैं स्वयं कभी मुकरियाँ लिखूँगा, मैंने ऐसा कभी नहीं सोचा था ।

हिन्दी एवं अंगिका भाषा के साहित्यकार श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ से मेरा मित्र-भाव है। उनसे मेरा परिचय हिन्दी भाषा साहित्य परिषद, खगड़िया (बिहार) के एक साहित्य सम्मेलन में हुआ। चलभाष पर एक-दूसरे की कुशलता एवं साहित्य सृजन के सम्बन्ध में संवाद प्रायः होता ही रहता है। एक दिन श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ ने बताया कि तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के हिन्दी विभाग अध्यक्ष डॉ. बहादुर मिश्र एक मुकरी संकलन का सम्पादन कर रहे हैं। श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’ ने मुझे भी इस संकलन के लिए मुकरियाँ भेजने एवं डॉ. बहादुर मिश्र से सम्पर्क करने हेतु कहा।

मैंने तब तक कोई मुकरी नहीं लिखी थी, किन्तु फिर भी डॉ. बहादुर मिश्र से बात करने का मन हुआ। चलभाष पर उनसे सम्पर्क हुआ तो उन्होंने बताया कि मुकरी संकलन शीघ्र ही प्रेस में जा रहा है। आप दो दिन में अपनी मुकरियाँ भेज दें। जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैंने उस समय तक कोई मुकरी नहीं लिखी थी फिर भी मैंने उन्हें कहा कि मैं प्रयास करूंगा। परिणामस्वरूप मैंने बाईस मुकरियाँ लिखीं एवं दो दिन बाद उन्हें डॉ. बहादुर मिश्र के पास भेज दिया। मेरी मुकरियाँ उन्हें पसंद आयीं। उन्होंने मुझे और मुकरियाँ लिखने की सलाह दी। मुकरी जैसे काव्य रूप में लिखना मुझ जैसे साधारण व्यक्तित्व के लिए असाधारण बात ही थी, फिर भी मैंने एक सौ एक मुकरियाँ लिखकर इसे संग्रह का रूप देने का प्रयास किया है।

मेरी सभी रचनाओं की प्रथम श्रोता मेरी जीवन संगिनी श्रीमती साधना ठकुरेला ही होती हैं। कई बार उनके परामर्श पर मैं रचनाओं में अपेक्षित बदलाव भी करता हूँ।

डॉ. बहादुर मिश्र ने इस कृति के बारे में दो शब्द लिखकर इसकी महत्ता बढ़ा दी है।

मैं डॉ. बहादुर मिश्र, श्री हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, जीवन संगिनी साधना ठकुरेला सहित उन सभी का हृदय से आभारी हूँ, जिनका इस कृति के सृजन में परोक्ष अपरोक्ष रूप से मुझे सहयोग मिला है। राजस्थानी ग्रन्थागार के श्री राजेन्द्र सिंघवी ने मेरे सृजन को पुस्तक रूप में पाठकों के समक्ष प्रस्तुत किया, इस हेतु उनका आभार प्रकट करना मैं अपना कर्तव्य समझाता हूँ।

यदि ‘आनन्द मंजरी’ पाठकों के लिए उपयोगी सिद्ध होती है तो मैं अपना श्रम सार्थक समझूँगा।

आपके सुझावों का सदैव स्वागत है।

– त्रिलोक सिंह ठकुरेला
बंगला संख्या-99,
रेलवे चिकित्सालय के सामने
आबू रोड़-307026 (राजस्थान)
मो. 9460714267

आत्मानन्द को जगदानन्द से जोड़ने वाली पुस्तक

‘आनन्द मंजरी’ त्रिलोक सिंह ठकुरेला का प्रथम मुकरी-संग्रह है। इसके पूर्व इनकी कई काव्य-कृतियाँ (मौलिक/संपादित) प्रकाशित होकर प्रशंसित हो चुकी हैं, प्रस्तुत पुस्तक ठकुरेला जी की सर्वथा मौलिक प्रस्तुति है।

‘आनन्द मंजरी’ कुल एक सौ एक मुकरियों का संकलन है, जिसकी पहली बाईस मुकरियाँ प्रकाशित हैं। ये मुकरियाँ (डॉ.) बहादुर मिश्र द्वारा संपादित ‘मुकरियाँ’ (अतुल्य प्रकाशन, दिल्ली, 2017) तथा ‘क्या सखि साजन?’ (संवेद-115 नई किताब, दिल्ली, 2018) में देखी जा सकती हैं।

जैसा कि आपको पता है, मुकरी द्विपक्षीय संलाप-शैली में रचित लोकप्रिय लोककाव्य-रूप है जिसमें भणिता शैली का प्रयोग होता है। भारतीय आचायोँ ने पहेली के सोलह प्रकार माने हैं। उनमें एक प्रकार ‘मुकरी’ से मिलता-जुलता है। पाश्चात्य विद्वान टिलियर्ड ने इसे ‘डिसगाइस्ड स्टेटमेंट’ नामक काव्य-कोटि के अंतर्गत रखा है। जैसा कि ऊपर निवेदित किया गया है कि मुकरी द्विपक्षीय वार्तालाप-शैली में निबद्ध काव्य-रूप है, इसमें एक वक्ता और एक श्रोता होता है। अधिकांश कथन वक्ता की तरफ से आता है। किन्तु, इसका अंतिम हिस्सा श्रोता की ओर से। इस तरह, वक्ता-श्रोता की भूमिका परस्पर बदल जाती है। इसका मूल उद्देश्य मनोरंजन और गौण उद्देश्य बुद्धि-परीक्षण या सूचनात्मक ज्ञान होता है।

मुकरी के आविष्कार का श्रेय अमीर खुसरो को दिया गया हैं। कालान्तर में भारतेन्दु, नागार्जुन, विजेता मुद्गलपुरी दिनेश तपन, हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, सुधीर कुमार ‘प्रोग्रामर’, आमोद कुमार मिश्र, रामविलास प्रगृति ने इसे गति और ऊर्जा प्रदान की।

अमीर खुसरो तथा अन्य मुकरीकारों ने परंपरित शैली का प्रयोग किया है। इसमें वक्ता-श्रोता की भूमिका में स्त्रियाँ ही होती हैं। किन्तु, विजेता मुदगलपुरी प्रभृति कुछ मुकरीकारों ने इस परंपरा को तोड़ा है। उनकी मुकरियों में स्त्री-पुरुष दोनों होते हैं। एक महत्वपूर्ण परिवर्तन इस रूप में देखा जा सकता है कि आज के दौर में लिखी जा रही मुकरियों में श्रृंगारिक विषय के अलावा देश-विदेश की विभिन्न समस्याएँ भी स्थान पा रही हैं। यद्यपि इसकी शुरूआत भारतेन्दु और नागार्जुन ने ही कर रखी थी, यथा – महँगाई, बेरोजगारी, पुलिसिया, दमन इत्यादि। जहाँ तक ठकुरेला जी की मुकरियों के ‘विषय-चयन और शैलीगत प्रयोग’ का प्रश्न है, शैली की दृष्टि से जहाँ इन्होंने परंपरा का दामन पकड़ रखा है, वहाँ विषय की दृष्टि से लोक छोड़ना ही उचित समझा। इनकी मुकरियों में वक्ता-श्रोता दोनों की भूमिका का निर्वाह दो सखियाँ करती हैं। यहाँ किसी पुरुष मित्र के प्रवेश की अनुमति नहीं है। और जहाँ तक विषय का प्रश्न है तो इन्होंने बयासी-तिरासी विषयों को आधार बनाकर मुकरियाँ रची हैं, यथा – डंडा (3 बार), तोता (3 बार), चंदा, ताला, माला, झुमका, मच्छर, दर्पण, साड़ी, सोना, भौर, पैसा, हाथी, सपना, सावन इत्यादि दो-दो बार विषय बने हैं। इन विषयों को कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। उदाहरणार्थ – (क)प्राकृतिक विषयाधारित मुकरियाँ, (ख)जीव-जगत से संबंधित, (ग)स्त्री के श्रृंगार और परिधान से संबंधित, (घ)रसोई और खान-पान से संबंधित, (ड़) राजनीति से संबंधित तथा (च)अन्य।

चंदा, तारा, फुलवारी, सावन, सवेरा, जाड़ा इत्यादि को आधार बनाकर रचित मुकरियाँ एक दर्जन से अधिक हैं। संकलन की पहली मुकरी ‘चंदा’ पर आधारित हैं, यथा –

जब भी देखूँ, आतप हरता ।
मेरे मन में सपने भरता।
जादूगर है, डाले फंदा। ।
क्या सखि साजन? ना सखि चंदा ।

इसी तरह, मच्छर-विषयक मुकरी देखिए –

बिना बुलाये, घर आ जाता ।
अपनी धुन में गीत सुनाता ।
नहीं जानता ढाई अक्षर /
क्या सखि साजन ? ना सखि, मच्छर ।

नारी के कर्णाभूषण झुमका पर केन्द्रित मुकरी देखिए –

मैं झूमूँ तो वह भी झूमे ।
जब चाहे गालों को चूमे ।
खुश होकर नाचूँ दे ठुमका ।
क्या सखि, साजन ? ना सखि, झुमका ।

अब महँगाई से जुड़ी मुकरी पर गौर फरमाइए –

जब-जब आती दुःख से भरती ।
पति के रुपये-पैसे हरती ।
उसकी आवक रास न आई ।
क्या सखि सौतन? ना महँगाई ।

देखा न, अंतिम मुकरी का रंग-ढंग बदल गया है।

ठकुरेला जी की ये मुकरियाँ 16-16 मात्राओं के क्रम-विधान से कुल 64 मात्राओं में रचित विशुद्ध मुकरियाँ हैं, जिनमें नियमपूर्वक चरणान्तर्गत आठवीं मात्रा पर यति का विधान किया गया है।

इस तरह ठकुरेला जी न केवल विषय की दृष्टि से बल्कि रूप और व्याकरण की दृष्टि से भी हिन्दी के महत्वपूर्ण मुकरीकार ठहरते हैं। विश्वास है, यह पुस्तक पाठकों का मनोरंजन के साथ-साथ मनः प्रबोधन भी करेगी। इस तरह यह अपने शीर्षक ‘आनन्द मंजरी’ को सार्थकता प्रदान करेगी। यह पुस्तक हिन्दी में एक बड़े विधागत अभाव की पूर्ति में भी सहायक सिद्ध होगी। शुभास्ते पन्थानः ।

18 अक्टूबर, 2019
-बहादुर मिश्र
प्रोफेसर: हिन्दी विभाग
ति. माँ. भागलपुर विश्विद्यालय
भागलपुर – 812007 (बिहार)

जाके राधाकांत हैं, ताके पूरे काम।
सारी ही माया मिले, सारे ही आराम।।

– त्रिलोक सिंह ठकुरेला

Leave a Reply