आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 2

जब भी देखूं, आतप हरता।
मेरे मन में सपने भरता।
जादूगर है, डाले फंदा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चंदा।

लंबा कद है, चिकनी काया।
उसने सब पर रौब जमाया।
पहलवान भी पड़ता ठंडा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, डंडा।

उससे सटकर, मैं सुख पाती।
नई ताजगी मन में आती।
कभी न मिलती उससे झिड़की।
क्या सखि, साजन? ना सखि, खिड़की।

जैसे चाहे वह तन छूता।
उसको रोके, किसका बूता।
करता रहता अपनी मर्जी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्जी।

कभी किसी की धाक न माने।
जग की सारी बातें जाने।
उससे हारे सारे ट्यूटर।
क्या सखि, साजन? ना, कंप्यूटर।

यूँ तो हर दिन साथ निभाये।
जाड़े में कुछ ज्यादा भाये।
कभी कभी बन जाता चीटर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हीटर।

देख देख कर मैं हरषाऊँ।
खुश होकर के अंग लगाऊं।
सीख चुकी मैं सुख-दुख सहना
क्या सखि, साजन? ना सखि, गहना।

दिन में घर के बाहर भाता।
किन्तु शाम को घर में लाता।
कभी पिलाता तुलसी काढ़ा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, जाड़ा।

रात दिवस का साथ हमारा।
सखि, वह मुझको लगता प्यारा।
गाये गीत कि नाचे पायल।
क्या सखि, साजन? ना, मोबाइल।

मन बहलाता जब ढिंग होती।
खूब लुटाता खुश हो मोती।
फिर भी प्यासी मन की गागर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सागर।

बार बार वह पास बुलाता।
मेरे मन को खूब रिझाता।
खुद को उस पर करती अर्पण।
क्या सखि, साजन? ना सखि, दर्पण।

बड़ी अकड़ से पहरा देता।
बदले में कुछ कभी न लेता।
चतुराई से खतरा टाला।
क्या सखि, साजन? ना सखि, ताला।

दाँत दिखाए, आँखें मींचे।
जब चाहे तब कपड़े खींचे।
डरकर भागूं घर के अंदर।
क्या सखि, गुंडा? ना सखि, बंदर।

वादे करता, ख्वाब दिखाये।
तरह तरह से मन समझाये।
मतलब साधे, कुछ ना देता।
क्या सखि, साजन? ना सखि, नेता।

रस लेती मैं उसके रस में।
हो जाती हूँ उसके वश में।
मैं खुद उस पर जाऊँ वारी।
क्या सखि, साजन? ना, फुलवारी।

बल उससे ही मुझमें आता।
उसके बिना न कुछ भी भाता।
वह न मिले तो व्यर्थ खजाना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, खाना।

चमक दमक पर उसकी वारी।
उसकी चाहत सब पर भारी।
कभी न चाहूँ उसको खोना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सोना।

 

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