आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 5

आनन्द मंजरी -मुकरी संग्रह-त्रिलोक सिंह ठकुरेला -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita By Trilok Singh Thakurela Part 5

लोहू-प्यासा, दुःख का दाता।
मौका पाकर खूब सताता।
हिंसक बातें अक्षर अक्षर।
क्या सखि, कातिल? ना सखि, मच्छर।

धूप देखकर रूप दिखाता।
संग साथ में दौड़ लगाता।
गायब होता पाकर छाया।
सखी, पसीना? ना सखि, साया।

कातर स्वर में माँगे खाना।
हर दिन आना, हर दिन जाना।
दुःख देती उसकी लाचारी।
क्या सखि, पशुधन? नहीं, भिखारी।

उसकी काठी भय से भरती।
देह छरहरी करतब करती।
उसने गाड़ा अपना झंडा।
क्या सखि, पट्ठा? ना सखि, डंडा।

उन्हें देख सब जय जय बोलें।
अपने मन की गठरी खोलें।
दर्शन कर मन होता चंगा।
क्या सखि, राजा? ना सखि, गंगा।

मेरे तन की भूख मिटाये।
मेरी खातिर जल जल जाये।
किन्तु नहीं बन पाया दूल्हा।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, चूल्हा।

बिठा पीठ पर सुख पहुँचाता।
मुझको लेकर दौड़ लगाता।
ना शर्माता, ना डर थोड़ा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, घोड़ा।

क्या बतलाऊँ सखि उसके ढंग।
निर्भय लेटे वह प्रियतम संग।
कभी न खाती माल-मिठाई।
क्या सखि, सौतन? नहीं, चटाई।

कभी पकड़ता वह बालों को।
कभी चूम लेता गालों को।
मैं खुश होकर देती ठुमका।
क्या सखि, साजन? ना सखि, झुमका।

मैं उसकी बाँहों में सोती।
मीठे मीठे स्वप्न सँजोती।
सखी, अधूरा बिन उसके घर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, बिस्तर।

दिन या रात कभी आ जाता।
मेरे मन को पंख लगाता।
मुझ पर करता जादू अपना।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सपना।

आग ताप से कभी न डरता।
सास बहू के मन की करता।
दृढ़ शरीर पर रहता सिमटा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चिमटा।

गर्मी हो या बारिश आये।
हाथ पकड़ कर साथ निभाये।
मेरे सुख दुःख सहता जाता।
क्या सखि, साजन? ना सखि, छाता।

जब चाहूँ तब सैर कराती।
गाने गाकर मन बहलाती।
कभी न मांगे गहने साड़ी।
क्या सखि, दासी? ना सखि, गाड़ी।

जल ले घूमे निपट अनाड़ी।
कभी भिगोये चोली-साड़ी।
लगता फिर भी वह मनभावन।
क्या सखि, साजन? ना सखि, सावन।

रूप रंग की बोले तूती।
मीठी लगती जब मुँह छूती।
सुख से भरती उसकी टक्कर।
क्या सखि, गणिका? ना सखि, शक्कर।

चमकीले मुख का आकर्षण।
करे दूर से सुख का वर्षण।
कभी न होगा मिलन हमारा।
क्या सखि, प्रेमी? ना सखि, तारा।

कभी बने वह शहद सरीखी।
कभी जहर सी लगाती तीखी।
वह दुःखदाता, वह कल्याणी।
क्या सखि, औषधि? ना सखि, वाणी।

जहाँ चलूँ मैं साथ घूमता।
चाटुकार सा पैर चूमता।
छोड़ूँ उसे न मेरा बूता।
क्या प्रिय, नौकर? ना प्रिय, जूता।

देह विशाल समुन्नत माथा।
मस्त चाल अचरज सी गाथा।
साथ निभाये बनकर साथी।
क्या सखि, साजन? ना सखि, हाथी।

मोटा पेट, गला है छोटा।
पानी देता भर भर लोटा।
परिचित हो या भूला भटका।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मटका।

नजर गिरे तब नजर मिलाये।
कान पकड़ संसार दिखाये।
उसका होना एक करिश्मा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, चश्मा।

उसके बिना लगे जग सूना।
मन में जोश भरे वह दूना।
नहीं किसी में बल उस जैसा।
क्या सखि, साजन? ना सखि, पैसा।

घर आँगन में चहक महक कर।

मन में मोद भरे रह रह कर ।
प्यारी, सुखद, खुशी की पेटी।
क्या सखि, चिड़िया? ना सखि, बेटी।
काला है पर फिर भी भाता।
वह आँखों में बस बस जाता।
आह भरें जन, होते पागल।
क्या सखि, साजन? ना सखि, काजल।

गोल मटोल बहुत ही प्यारा।
भर देता मन में उजियारा।
उसको साथ देख खुश होती।
क्या सखि, साजन? ना सखि, मोती।

उसके बल पर मैं सब करती।
सच कहने से कभी न डरती।
वह अपना है उससे क्या डर।
क्या सखि, साजन? ना सखि, ईश्वर।

 

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