आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 7

आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 7

 

कौन सी दुनियाँ?

बाहर के उजाले से मेरा मन भर गया हैं।
ये कौन सी दुनियाँ हैं, जहां दिल सड़ गया हैं॥
सड़न ऐसी की, बदबू भी आती नहीं हैं।
साथ में रहने पर भी, कुछ समझ आती नहीं हैं॥
चमकता हैं ये दुनियाँ, चाँद तारों से भी ज्यादा।
मगर हर आदमी परेशान हैं, बेतहाशा॥
नहीं बदला हैं ये दुनियाँ, पत्थरों के जामने से।
आज भी लोग मरते हैं,किसी के बाजी लगाने से ॥
मुझे तो आज भी ये दुनियाँ, सदियों पुरानी हैं ।
जहाँ पे दास बिकते थे, रईसों के फँसाने पे ॥
जान की कोई कीमत हैं नहीं, इस चकाचौंध दुनियाँ में ।
आज भी लोग मरते हैं, एक रुपया बहाने पे ॥
अगर तुमको लगे की आज ‘कमल ‘ गलत लिखता हैं।
चले जाओ आँख भर देख लो, गँगा किनारे पे ॥
कल की बात हैं, जब एक-एक को मार देता था ।
हजारों लोग मरते हैं, आज एक बम लगाने से ॥
कौन सी दुनियाँ में रहते हो, गौर से सोच के देखो ।
आँख से पर्दा उठाओ, और अपने से ही पूँछ के देखो ॥
एहसास तुम को तब होगा, की सब फरेब का जाल हैं ।
हर गरीब को अमीर का बनना रुमाल हैं॥
जैस छोटी मछली को बड़ी निगल जाती हैं।
छोटी को खा-खा के वो और भी मोटी हो जाती हैं ॥
आज का आदमी भी अपने से, छोटे को खा रहा हैं ।
आदमी-आदमी को ही कीड़ा-मकौड़ा समझ रहा हैं॥

 

मैं भी भारतवासी हूँ?

मैं भी उसी देश का वासी,
जिसका गीत तुम गाते हो।
फर्क यही हैं तुम नेता हो,
भारत को मूर्ख बनाते हो।
आज भी जनता कराह रही हैं,
आज भी जनता रोती हैं।
सुशासन की बात ही छोड़ो,
घुट-घुट जीवन जीती हैं ।
हां कुछ लोगों का घर उज्जवल,
कुछ लोग के मौज बड़े।
चाटुकार जो हैं नेता के,
उनके तो हैं मान बड़े।
ये स्वराज हैं या मन-मानी,
घर गरीब के जा कर देखो।
दवा बिना मरते हैं बच्चे,
दिल्ली छोड़ कही और भी देखो।
तुम कहते हो सब अच्छा हैं,
सब उन्नत हैं भारत में।
पर भारत वालों से पूछो,
जो बैठे हैं विदेशों में।
वो भी चाहे घर को आना,
उनका भी अरमान बहुत।
नहीं चाहिये लाखों रुपये,
नहीं चाहिए मान बहुत।
कोई भी हो गैरदेश में,
गैर ही समझा जाता हैं।
कितना भी हो मान प्रतिष्ठा,
गैर ही समझा जाता हैं।
बस उनको कुछ काम दिलादो,
ओ भी देश के लिए जिये
बहुत हो गया दुनियाँदारी,
देश का खाये, घर में रहे।।

 

दुःख के दिन

हैं घना अंधेरा छाया सा, सूरज भी हैं शरमाया सा,
हर ओर विवशता छायी हैं, दिन क्या विपत्ति की आयी ?
मन डोल रहा हैं पल-पल यूं, जैसे नौका हो डोल रही,
तन कांप रहा हैं थर-थर यूँ, जैसे कम्पित सारा भू,
मन भाग रहा हैं इधर-उधर, जैसे तरू की फूनगी डोले,
कम्पित तन हैं, कम्पित मन हैं, मुख पर हैं काले नभ डोले,
पलके गिरना हैं भूल गयी, जैसे कलियों से फूल बने,
दिल सोच रहा हैं रो-रो के, हैं रहा नहीं कोई अपना।।
सारा दुःख मुझ पर ही क्यों हैं?
भगवान भाग्य क्यों ऐसा अपना?
दिन-रात समझ न आता हैं, पल लगता हैं सदियों जैसे,
दुःख के डेरे में बैठा हूँ, हैं नही रस्ता और कोई,
सहमा हूँ,सिसकी भर-भर के मेरा अपना हैं नहीं कोई।।
इस दुःख के क्षण में हमें कोई, गर अपन कहने आ जाऐ,
यदि बहुत नहीं तो थोड़ा सा, मेरे घावों को सहलाएं,
बैठा ओ मेरे पास रहे, हाथों में हाथ पकड़ बोले,
तुम डरों नहीं, तुम सहमों मत, हूँ साथ तुम्हारे यहीं खड़े,
दुःख से क्या डरना हे प्यारे, मैं भी अब साथी हूँ तेरा,
तू नहीं अकेला इस पथ में, मैं भी हूँ अब पाथी तेरा।।
तू क्यों डरता हैं इस दुख से, मिलकर अब कदम बढ़ाएंगे,
इस जीवन में ही हम दोनों, फिर नया सवेरा लाएंगे,
दुःख नहीं कोई अविरल पथ हैं, दुःख नहीं हिमालय सा चौड़ा,
दुःख नहीं अमिट, दुःख नहीं सघन, दु:ख नहीं समय सा हैं पौड़ा
मिलकर हम जोर लागाएंगे, दुःख कही नहीं टिक पाऐगा
मिलकर हम कदम बढ़ाएंगे, हर तरफ उजाला छायेगा।।

 

कमल का जीवन

कीचड़ में कमल खिलता हैं, ऐ कहना आसान हैं,
दिखता वो बहुत खुश हैं, पर अंदर से परेशान हैं,
जीवन कमल का ज्यादा, बिन फूल बीतता हैं।
रहता जलमग्न ही हैं, जब तक न फूलता हैं।।
कीचड़ में जन्म लेके, धाराओं में बहता हैं।
जलचर भी नोचते हैं, दुःख बहुत ये सहता हैं।।
क्या दुःख भरा हैं जीवन, ठंडक में फूलता हैं।
सिसकी बहुत सी लेके, ठंडक से जूझता हैं।।
कितनी अजब विधि हैं, दुखमय हैं इसका जीवन।
खिलते समय भी रहता, अंधियारा इसका जीवन।।
कलियों का काल भी, इसमें बहुत हैं लम्बा।
खिलता हैं कई दिन में, अंधियारी रात लम्बा।।
दुःख इसका और भी हैं, रहता सदा अकेला।
सिर्फ एक फूल लगता, इसके तन में अलवेला।।
पर जब कमल फूलता हैं, लगता बहुत ही सुन्दर।
दुःख दर्द भरे जीवन में, जैसे हो सुबह सुन्दर।।
भौरों के झुंड आके, करते हैं खुब स्वागत।
नवगीत छेड़ते हैं, करते हैं बहुत स्वागत।।
आती नयी सुबह हैं, नव किरण बहुत लेके।
ठंडी हवा भी जाती हैं, झूम-झूम छु के।।
रातों के ओश अब तो मोती सा हो गये हैं।
कल तक थे ये काटों सा, अब गहने बन गये हैं।।
चम-चम चमक रहे हैं, फूलों पे कलम के ये।
पंखुड़ियों पर हैं चिपके हीरो के हार जैसे।।
सूरज की किरण आके, करती इन्हें सुनेहला।
मोती फिर टुट जाते, होता जब दिन दुपेहला ।।
मोती का टुट जाना, हैं ज्ञान की एक धारा ।
इसमें भरा हुआ हैं, जीवन का सार सारा।।

 

मेरा पथ बहुत पथरीला था

मेरा पथ बहुत पथरीला था,
मै कैसे यहां तक आ गया,
चलना भी न मुझे आता था,
कैसे में धावक बन गया,
मेरे पैर तो कमजोर थे,
पर मैं पहाड़ चढ़ गया,
मै तो पड़ा था धूल में, पर कैसे मैं फूल बन गया।।
अंधेरों की दुनियाँ थी मेरी,
मेरे रीढ़ की हड्डी न थी,
मैं डूब रहा था मझधार में, पर मैं तैराक बन गया।।
मेरे हर ओर उदासी ही थी,
मैं बैठा था शमशान में,
शमशान की थी जिन्दगी,
मैं शून्य में था जी रहा,
मेरा बचपन क्या बेरहम था,
खाने को भी लाले पड़े,
थी गरीबी इस तरह की हम दानों के लिए लड़ पड़े ।।
बीते इसी तरह जीवन के सालो-साल,
मैं देखते ही देखते मैं बन गया अपने घर का लाल,
ये लाल बेच के मेरी, माँ गरीबी चुका सकती थी,
वो अगर चाहती तो मुझको किसी काम पे लगा सकती थी,
हो सकता हैं मेरे घर की गरीबी मिट जाती,
मेरी बहनों की शादी, बिन कुछ गिरवी रखे हो जाती,
लाल के बिकने को, दुनियाँ ने गोटे बहुत फेंके,
पर मेरी माँ ने, मुझमें कुछ और देखे ।।
माँ ने कहा मैं तुझको तरासुगी,
ये अपना जीवन लगा के,
सवारूंगी मैं, तुझे अपना तन-मन लगाके,
अगर तू हीरा हैं, तो असली चमक भी आयेगी,
हैं क्या गरीबी, और क्या अमीरी समझ तुझको आयेगी।।
तुम्हे अपने पे विश्वास आज से करना होगा।
अपने ईश्वर की अंगुली पकड़ के चलना होगा।

तुम्हारा कोई नहीं हैं, इस जहां में ईश्वर के शिवा,
तुम्हें अपने ही कदमों पे खड़ा होना होगा,
अगर तू दूसरों के हाथ का लाठी बनेगा,
कठिनाई कितनी भी हो, फिर जीवन मूल्यों पर ही चलेगा,
चमक के निकलेगा, तू एक दिन जैसे सितारा,
जहाँ से फुटेगी खुशियों से भरी ज्ञान धारा,
ये जो तेरा ज्ञान होगा गरीबी से लड़ेगा,
समझेगा सही-गलत, तभी तू जीवन की कहानी गढे़गा।

 

जीवन क्या हैं?

जीवन में बहुधा हम हँसते, गाते, मौज मनाते हैं,
अपने ही धुन में रहते हैं, जीवन समझ न पाते हैं,
क्या जीवन पैदा होने और मरने की बीच कथा?
या खाना, पीना, सो जाना, भोग और कुछ कर्म वर्था,
क्या ऐ जीवन अपने को सीमित रखने के लिए बना ?
या इतना प्रसारित करना जितने में आकाश तना,
क्या जीवन की सीमा हो बस, कुंटुब और परिवारों तक?
या फैला हो मधुर पवन सा, सब को ठंडक देने तक,
क्या जीवन ठंडी, गर्मी, सुख, दुख की एक पहेली हैं ?
या सारे रंगों से मिलकर बनी एक रंगोली हैं,
इन प्रश्नों का हल जीवन, हर बार सभी से मांगेगा,
जाने-अनजाने में, तुमसे भी राग ये ठानेगा,
‘कमल’ तुम्ही अब कुछ लिख दो, कैसी ये जीवन धारा हैं,
दूर से अति सुन्दर लगती हैं, पर ऐ दुःख का धारा हैं,
हर जीवन में सुख-दुःख हैं, परिमाण न तुम इसका पूछो,
अपनी-अपनी दृष्टि हैं, तुम इस पर रेखा मत खींचो,
युद्ध तो सैनिक लड़ते हैं, पर क्या सब बन जाते हैं वीर?
रण आहूति सब देते हैं, पर होता हैं एक रणधीर,
इसी तरह ये जीवन हैं कर्म, प्रारब्ध में बंधा हुआ,
जिसको जो बनना होता रहता हैं, वो रहता हैं सधा हुआ,
करते-करते कर्म वो पारंगत हो जाता हैं,
इस दुनियाँ में वो अपना छाप छोड़ के जाता हैं।

 

जंगलों की जाति

जंगलों की जाती हूँ मैं क्या करूँ,
धुप,घाम,बंजरो में हूँ पला,
बाढ़ भी सहता रहा हूँ क्या करूँ,
अपनी तो ये जिंदगी अनचाही हैं,
भूख में सोता रहा हूँ क्या करूँ,
जन्म से मैं बहुत ही नीरस रहा हूँ
कांटे अपने दोस्त हैं तो क्या करूँ
जंगलों की जाती हूँ मैं क्या करूँ…
जब धरा ने मुझको अंकुरित किया था ,
तब गगन में हमको सिंचित किया था
जब गगन ने चूमा मुझको पकड़ के,
आँधियों ने तब सिखाया रहना जम के,
इसलिए कुरूप हूँ मैं क्या करूँ,
जंगलों की जाती हूँ मैं क्या करूँ….
मैं तुम्हारे जैसा उपवन से नहीं हूँ,
मैं तुम्हारे जैसा कुलबन से नहीं हूँ,
मैं तुम्हारे जाति का हूँ एक आवारा,
जिसको प्रकृति ने दिया हैं सहारा,
तुमको माली ने हैं पाला खाद दे के,
मैं पला हूँ तूफानों की थाप लेके,
तुम क्या जानो, जिंदगी हैं क्या झमेला,
हैं तुम्हारा जिंदगी खुशियों का मेला,
मैं बहुत बेढब, बहुत उखड़ा रहा हूँ,
सभ्यता तुम सा नहीं मैं क्या करूँ,
जंगलों की जाती हूँ मैं क्या करूँ,
पर मुझे शिकवा नहीं हैं जिंदगी से,
मुझको ईर्ष्या भी नहीं यूँ किसी से,
मैं तो बस इस बात पे इठला रहा हूँ
सोच के हंसता हूँ, मुस्कुरा रहा हूँ
कांटे हो या फूल, धूप या धमेले ,
कस्तूरी की महक या धूलों के रेलें
सब के साथ रह के गुनगुना रहा हूँ
जंगली हूँ धूप धाम सह रहा हूँ ,
स्वलंबी हूँ स्वयं का भान हैं ,
जंगली हूँ इसी का अभिमान हैं ,
मैं किसी जैसा बनू धिक्कार हैं
यही अपनी सोच हैं मैं क्या करूँ

 

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