आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 6

आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 6

 

हिंदी या अंग्रेजी

मैं हिंदी का प्रेमी हूँ,
अंग्रेजी देती हैं रोटी।
द्वन्द मेरे अंतर्मन में हैं,
हिंदी बड़ी या इंग्लिश छोटी ?
केवल मृदु भी लिख सकता हूँ,
पर कटाक्ष की आदत खोटी,
हिंदी-अँग्रेजी से पहले,
सब को चाहिए दो-दो रोटी ।
जो हिंदी का झंडा लेके, अँग्रेजी में गरियाते हैं,
वही मेरे प्यारे बंधु, समाज को गलत बताते हैं।।
जब सबके पापा हैं सच्चे,
तो भ्रष्टाचार कहाँ से आया?
गाँव को देशी कहने वालों,
टाई-बेल्ट कहाँ से आया?
हैंप्पी बर्थडे कौन मानता,
कौन काटता लाखों का केक ?
पिज्जा, चिकन कौन हैं खाता ?
ये भी बोलो मेरे दोस्त !
मैकडोनाल्ड में बर्गर खाना, पहले छोड़ो मेरे भाई।
अरे गुलामी मन में हैं, बस मन को साफ करो भाई।।
अलबेला हैं अपना भारत, हृदय स्वच्छ करो भाई।
पहले पापा-मम्मी छोड़ो, बोलो बप्पा और माई।।
अपने माँ से प्रेम हैं उत्तम,
अपने माँ का चरण गहों ।
अपनी संस्कृति हैं उत्तम,
भारतीयता का मान रखो।
भारतीये भाषा और भोजन,
हमको तो अपनाना हैं।
हां कांटा और चम्मच छोड़ के,
हाथ से भोजन पाना हैं।
अँग्रेजी से घृणा नहीं, अंग्रेजीयत छोड़ो हे लाला।
उनके मां को गाली देके, होगा अपना मुँह काला।।

 

पढ़ते गये, पढ़ते गये

पढ़ते गये, पढ़ते गये, हम तो आगे बढ़ते गये,
डिग्रियां मिलती गयी, शान भी बढ़ते गये,
हाथ भी बढ़ता गया, पांव भी बढ़ते गये,
आन भी बढ़ता गया, मान भी बढ़ता गया,
हम बढ़े कुछ इस कदर कि,
नाम भी बिकने लगा, काम भी बिकने लगा,
मुझसे जुड़ी हर चीज की कीमतें बढ़ती गयीं,
पढ़ते गये, पढ़ते गये, हम तो आगे बढते गये,
डिग्रियां मिलती गयी, शान भी बढ़ते गये,
हम खरीद सकते हैं ईमान को भी पैसे से,
इन्सान को भी पैसे से, भगवान को भी पैसे से,
माँ-बाप की क्या बात हैं वो तो मेरे तलवे-तले,
हर रात पी के झूमना, हर बार नयी लड़की चूमना,
सिगरेट भी बढ़ते गये, शराब भी बढ़ते गये,
पीते नहीं हम देशी हर रोज, ऐ कहते गये।
पढ़ते गये, पढ़ते गये, हम तो आगे बढ़ते गये,
डिग्रियां मिलती गयी, शान भी बढ़ते गये,
माँ-बाप से लड़ते गये, उनसे भड़कते भी गये,
हर बात में कहते गये, की तुम तो ट्रेडिसनल रह गये,
मुझको तो देखो ध्यान से, हम तो अंग्रेज बन गये,
आजाद भारत देश हैं, आजाद रहना हक मेरा,
हम क्या करें ? कैसे करें ? इतना तो हम हैं पढ़ लिये,
मुझको मत सिखाओ कोई कैसे जियें, कैसे रहे,
मगर ………………………..
झकझौर के एक दिन मेरे वजूद ने तन्हाई में मुझसे कहा,
तुम क्या पढ़े, तुम क्या बढ़े, मुझको बताओ तुम क्या गढ़े,
नंगे चलना सीख के, तहजीब अदब भूल के,
अय्याश हो तुम बन गये, डूबे रहते हो अवसाद में,
कहते हो कि हम बढ़ गये ?
न नींद आती रातों में, न चैन दिन में पाते हो,
न होश में घर आते हो, न घर का खाना खाते हों,
अपने माँ-बाप को अपना कहने में शर्माते हो,

इन डिग्रियों के साथ में पागल हुए तुम जाते हो,
पशु भी नहीं तुम रह गये, कहते हो कि तुम पढ़ गये,
कहते हो कि हम बढ़ गये ?
उन नजरों को रोको जरा, जो हर लड़की पर उठ जाती हैं,
न माँ समझ आती हैं, न बहन नजर आती हैं,
उन लब्जों को टोंको जरा, जो प्यार को अय्याशी का नाम देती हैं,
हर बात में फरेब हैं, झूठा लिबाश पहने हो, इन डिग्रियों के आड़ में,
सबको जलाये जाते हो।
कल तक जो ईमानदार, एक सीधा भोला इन्सान था,
न जानता था कुछ बुरा,
तुम जैसे शैतान ने इनको भी बुरा कर दिया,
कहते हो की हम बढ़ गये, कहते हो की हम पढ़ गये ?
न संयम तुममें रह गया, न शर्म तुममें रह गया,
न ज्ञान तुममें रह गया, न संस्कार तुममें रह गया।।
घमंड में हो भर गये, न सीखना हो चाहते,
फिर भी तुम कहते हो, कि हम बढ़ गये, हम पढ़ गये।।
हे ‘कमल’ यदि ये पढ़ना हैं, तो फाड़ दो डिग्रियाँ,
जला दो झूठे शान को, जला दो, झूठे आन को,
न हम बढ़ेंगे इस तरह, न हम पढ़ेंगे इस तरह।।
हम तो रहेंगे इस तरह, जिससे अपनों से जुड़ सकें,
अपनों के गले लग सके, उनको भी गले लगा सके,
नशे से कोशों दूर हो, प्यार करने पे मजबूर हो,
अवसाद न हमको छु सके, न ऊँच-नीच हो कोई,
गर ऐसा कर गये, तो फिर कहेंगे, तुम पढ़ गये, तुम बढ़ गये।
वास्तव में सबके लिए काम तुम कुछ कर गये।।

 

आज के युवा नेताजी

मंत्रीजी के पाँव छू के,
आज मैं गद-गद हुआ।
फेसबुक के भाइयों,
देखो मैं नेता बन गया।।
मंत्रीजी के साथ फोटो,
आज मैंने ले लिया।
जन्मों की थी जो तपस्या,
आज सफल कर लिया।।
इतने आसानी से,
मंत्रीजी मिलते नहीं।
गाँव में कल नाच था,
दौड़ के सेल्फी लिया।।
वर्षों से पीछे लगा हूँ,
मंत्रीजी के पाँव के।
चाटुकारिता किया हूँ,
घर-दुवार छोड़ के।।
अपना सारा काम छोड़ा,
मंत्रीजी के प्रेम में।
पीछे-पीछे मैं चला हूँ,
भीड़ धक्कापेल में।।
मंत्रीजी सालों तक मेरा,
नाम भी पूछे नहीं।
फिर भी मैं डटा रहा,
धैर्य को छोड़ा नहीं।।
चाय-पानी भी किया हूँ,
मंत्रीजी के द्वार पर।
ऐरा-गैरा समझो मत,
देश के हूँ काम पर।।
आत्मत्याग देखो मेरे,
देशप्रेम के लिए।
बच्चे घर में रो रहे हैं,
नये गणवेश के लिए।।

मैं तो देशप्रेम में,
पिस्ता बादाम खाता हूँ ।
मंत्रीजी के पार्टियों में ,
मीट-मुर्गा खाता हूँ।।
मैं शराब का आदि नही हूँ दोस्तों,
मंत्रीजी की बात को काटू कैसे दोस्तों ।
इसलिए दो-चार घूँट,
बियर मार लेता हूँ ।
ज्यादा नहीं हफ़्ते में,
दो चार बार लेता हूँ।।

 

जागो हिन्दू

चलो पुनः सागर मथते हैं,
चलो स्वयं को फिर गढ़ते हैं।
हम तो हैं दधीचि के वंशज,
चलो पुनः अस्थि घिसते हैं।।
शताब्दियों की सुषुप्ता ने,
तेजहीन, निष्क्रिय किया हैं ।
मन को ऊर्जाहीन किया हैं,
तन को प्राणविहीन किया हैं ।।
कड़ी दासता की रस्सी ने,
आत्मा को भी जीर्ण किया हैं ।
चलो त्याग और कर्मठता से,
पुनः आत्मशुद्धि करते हैं ।।
चलो पुनः सागर…
तुम हो नृप इस पूर्ण धरा के,
तुम हो पालक मानवता के।
परोपकार की हो परिभाषा,
शौर्य, अदम्य साहस की भाषा।
रोम-रोम में त्याग भरा,
रुधिरधामिन में अग्नि भरा।
हे वीरो अगस्त के वंशज,
चलो पुनः सागर पीते हैं ।।
छोड़ो क्षणिक लाभ लोलुपता,
छोड़ो कल की दुख और चिंता ।
तुम हो आर्य भरत के वंशज,
आज के हिन्दू कल के प्रजापति ।
हे, हे, हे, वासुदेव के वंशज,
चलो दुर्योधन से लड़ते हैं
चलो पुनः रण में चलते हैं
चक्रव्यूह फिर से रचते हैं ।
जन्मभूमि, जननी के कारण,
स्वयं का आहुति देते हैं ।।
चलो पुनः सागर…
हैं अस्तित्व आज संकट में,
भारत बंट रहा हैं टुकड़ों में,
माँ की आन पे आँच लग रही,
वैभव पर हैं काली छाया,
दुष्ट खड़े हैं घात लगाए,
कुछ अपने भी हैं भरमाये।
चलो रुद्र बन के ढहते हैं,
रुधिर की गंगा में बहते हैं।।
चलो पुनः सागर…
चामुंडा के हो सुपुत्र तुम,
रक्त चाट के हुए युवा तुम,
बचपन में हो सिंह से खेले,
इंद्र के बज्र को हो तुम झेले,
मगर आज तुम क्यों डरते हो?
स्वयं ही क्यों कुंठित होते हो,
दिग्विजयी होकर सहते हो?
चलो उठो रण को चलते हैं,
हल्दीघाटी में लड़ते हैं।
चलो पुनः सागर…

 

ऊबड़-खाबड़ जीवन

सारे जीवन भर मैं गाया,
हर पल ही मैं मौज मनाया।।
ऊबड़-खाबड़ मेरा जीवन,
उचक-विचक के चलता आया।।
कभी सही तो, कभी गलत था,
कभी शांत तो, कभी खटक था।।
कभी प्रेम तो, कभी कड़क था,
मैं रसमय और नीरस भी था।।
मेरा जीवन उथला-पुथला,
हैं विचार भी, धुंधला-धुंधला।।
मन में सागर के हिलकोरे,
दिल और दुनियाँ को झकझोरे।।
मैं इसमे ही फंस जाता हूँ ,
फिर दुनियाँ मे रम जाता हूँ।।
सिसकी भर के ढह जाता हूँ,
गाते-गाते रुक जाता हूँ…
हैं कुछ उलझन दिल-दिमाग में,
पाने-खोने के फिराक में ।।
फिर भी सब पे चढ़ जाता हूँ,
सपने लेके के बढ़ जाता हूँ।
सिसकी भर के ढह जाता हूँ ,
गाते-गाते रुक जाता हूँ ।।

 

इन्तजार

इन्तजार उस दिन का इन्तजार हैं,
जब हम बदल जाएंगे,
वो भी बदल जाएंगे,
सब कुछ बदल जाएगा
हर रंग बदल जाएगा,
हर रूप बदल जाएगा,
हर जाति बदल जाएगा,
हर धर्म बदल जाएगा,
हर शक्स बदल जाऐगा,
ये वक्त बदल जाएगा,
उस दिन का इन्तजार हैं,
जब सब कुछ बदल जाएगा ।।
न कोई सीमा हो जहाँ,
न कोई बंधन हो जहाँ,
न नफरत की बूँ हो,
न बाँटने की बात हो,
न काटने की बात हो,
न टूटने का भय हो,
न फूटने की बात हो,
न कोई कभी उदास हो,
न कोई यहाँ खास हो,
ऐसा जहाँ बनाएंगे,
जब सब कुछ बदल जाएगा।।
जहाँ जातिवत न मान हो,
जहाँ ज्ञान ही आधार हो,
जहाँ सब को सम्मान,
जहाँ सबके हाथों में काम हो ।
उस दिन का इन्तजार हैं,
जब हम बदल जाएंगे।

This Post Has One Comment

Leave a Reply