आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 3

आनंदार्थी -डॉ. संतोष तिवारी -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Dr. Santosh K.Tiwari Part 3

 

मन का निर्णय

मन में कई गांठ हैं,
मन में हैं आनंद भी।
हृदय में करुणा-प्रेम भी,
हैं कई दीवार भी।।
स्वयं ही निर्णय करो,
कौन सा जागृत रहे
ईर्ष्या, घृणा और जलन,
यदि किसी ने हैं दिया।
प्रेम भावना के बदले,
तिरस्कार हैं दिया।।
फिर भी दुख के साथ जीना,
स्वयं पर अन्याय हैं,
स्वयं का ही हानि हैं ।।
घृणा स्वयं को जलाती,
बेदना तड़पाती हैं।
ईर्ष्या नीचता की सीमा,
तक हमें पहुँचाती हैं।
किसी से उम्मीद ज्यादा,
हृदय छेद जाती हैं।।
इसलिये आनंद में,
स्वयं को संचित करो,
स्वयं को प्रज्वलित करो,
आशा छोड़ो औरों से,
क्यों न कितना प्रिय हो।
उनसे दूर ही रहो,
जो तुम्हे समझें नहीं।।

 

स्वार्थ ही संसार हैं

जब तक स्वार्थ सभी हैं साथी,
सायंकाल अकेला होगा।
इसलिये सिखों अकेले चलना,
अंतिम राह अकेला होगा।।
कोई नहीं तेरा हैं मनुआ,
तू भी नहीं किसी का प्यारे।
मनमें क्यों भ्रम पाल के बैठा,
कुछ भी नहीं हाथ में प्यारे।।
तुझको स्वयं में रमना होगा।
लिया-दिया जो था कल तुमने,
उसे आज ही भरना होगा।।
जन्म-जन्म के कर्मों का फल,
हर प्राणी को भरना होगा।
खेल निराला हैं जीवन का,
सुख-दुःख हमको सहना होगा।।
जब तक स्वार्थ सभी हैं, साथी,
सायंकाल अकेला होगा।
इसलिये सिखों अकेले चलना,
अंतिम राह अकेला होगा।।

 

मेरी अभिलाषा

सुख-दुःख में अन्तर ही पाऊँ,
पर अभिलाषा ये हैं मेरे,
एकदिन मुक्त जीव बन जाऊँ।।
दुःख में सुख ढूंढो तो जानूं,
सुख-दुःख एक समझो तो मानूं।।
आत्मा शास्वत, समय पुरातन,
कोटि-कोटि जन्मों का बंधन,
सब बंधन तोड़ो तो जानूं,
तन-मन एक करो तो मानूं ।।
जीवन हैं एक अविरल धारा,
पर न छोर, न कोई किनारा।
बहना कर्म हैं, बहता जाऊँ,
थाह नहीं ये किधर को जाऊँ ।।
कहाँ से चला, कहाँ मैं जाऊँ?
कुछ भी तो मैं समझ न पाऊँ ।
जन्मों का कर्तव्य लिए मैं,
अधिकारों में उलझा जाऊँ ।।
स्वयं को ही मैं टटोल रहा हूँ,
कर्तव्यों से तौल रहा हूँ ।
अधिकारों का बंधन कुण्डित,
कर्तव्यों से तोड़ रहा हूँ।।
अधिकारों का उलझन हर पल,
कर्तव्यों से टकराता हैं।
कृत्य-अकृत्य का भेद मिटा के,
आत्मा को जर्जर करता हैं।।
सुख-दुःख में अन्तर ही पाऊँ,
पर अभिलाषा ये हैं मेरे,
एक दिन मुक्त जीव बन जाऊँ ।।

आज के रिस्तेदार

मेरे भी कुछ संग-साथी हैं,
जो सब कुछ अजब सुनाते हैं।
जूतों का ब्रैंड बताते हैं,
बिसलेरी बोतल दिखलाते हैं।।
पीता नहीं मैं, नल का पानी,
आतिथ्य को भी बतलाते हैं।
अपनी लम्बी-चौड़ी बातें,
हरपल सब को समझाते हैं।।
मेरे भी कुछ संग-साथी हैं…..
मेरे घर जब ओ आते हैं,
पानी का बोतल लाते हैं।
मेरे भी ऐसे साथी हैं,
जो शर्ट का ब्रैंड बताते हैं ।।
इस बात में मुझको संशय हैं,
की वो मेरे रिश्तों में हैं।
पर हैं समाज का डर भारी,
तो कहने को ओ अपने हैं।।
जीवन का खेल निराला हैं,
मैं उनको अपना कहता हूँ।
कुछ मर्यादा हैं, हे! मेरे भाई,
मैं उनको हाँ, हाँ करता हूँ।।
मेरे भी कुछ संग-साथी हैं…..

 

जागो, उठो, चलो रे साथी

जागो, उठो, चलो रे साथी ।
तुम्हें बुलाता तेरा पाथी।।
अपने मन को मुक्त बनाके,
सांसो में चिंगारी भरके,
पैरों की बेड़ियां खोलके,
आत्मभाव में उल्लासित हो,
बढ़ो, चलो आगे को साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी …
जग के सब जंजाल तोड़के,
कल के दुःख-चिंता को छोड़के,
मोह के बंधन कुंठा तोड़के,
अपने को अग्नि में झोंकने,
अहम का आहुति दो साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी …
माना एक दीपक जलने से,
माना बस तेरे चलने से,
अंधकार न मिटने वाली,
दुनियाँ नहीं बदलने वाली,
पर तेरा कर्तव्य हैं चलना,
सत्य के पथ पर आगे बढ़ना,
तू बढ़ता जा मेरे साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी …
अंधकार से लड़ता जा तू,
स्वयं को सिद्ध बनाता जा तू,
अंगारो पे चलता जा तू,
अपने लक्ष्य को देख रे साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी …
मरने का भय मत रख प्यारे,
जीना बस कुछ दिन के सहारे,
सांसो का क्या गिनती करना,
बिलख-बिलख कर क्या हैं मरना?
लक्ष्य समर्पित हो जा साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी …
अपयश और अभाव, दरिद्रता,
जीवन में यदि न हो निष्ठा,
भावुकता यदि मन में न हो,
फिर क्या जीना मेरे साथी ?
जागो, उठो, चलो रे साथी …
कर्म ही जीवन, कर्म ही जीना,
उल्लासित मन जैसे मीना,
दुःख-सुख तो हैं आना-जाना,
फूलों सा जीवन क्या पाना,
तालाबों का गंदा पानी,
नदियों से सा बहता जा साथी,
जागो, उठो, चलो रे साथी।
तुम्हें बुलाता तेरा पाथी।।

 

भारत के पर्व-त्यौहार

भाग- १

पूर्वजों का चिन्ह हैं,
भारत के त्यौहार सब।
पूर्वजों को नमन कर,
कुछ विचारें हम सब।।
अतिपुरातन सभ्यता का,
आओ अवलोकन करें।
राम, कृष्ण से पुरानी,
सभ्यता जीवित करें ।।
हम मनाते क्यों दीवाली,
इसपे भी मंथन करें।
दीवाली के तत्व पर,
आओ कुछ चिंतन करें।।
श्रीराम और काली के,
कर्तव्यों की ये गाथा हैं ।
दुष्टों के निर्मूलन का,
ये यशस्वी गाथा हैं ।।
दीवाली पर दीपमालिका,
आत्म प्रकाश का तत्व हैं।
स्वयं के अवलोकन का,
ये पुरातन कृत्य हैं ।।
दीपों के प्रज्वलन का अर्थ,
हृदय में उजियारे से हैं।
दीप प्रज्वलन का तत्व,
आध्यात्मिक उन्नत से हैं ।।
दीप जलता हैं कहिं तो,
अंधकार मिटता हैं ।
एक छोटा सा दीप,
सघन तिमिर से लड़ता हैं ।।
दीप बुझ सकता हैं,
लाखों विघ्न के आने से।
आत्म प्रकाशित होगा तो,
जग ही बदल जायेगा ।।

भाग-२

दीपों का हैं मिलन दीवाली,
दीपों का ये हैं संगम।
दिल में प्रेम का दीप जला के,
दूर करो सारे गम ।।
हर घर के कोने-कोने में,
दीपमालिका हैं उत्तम।
स्वजनों के संग खुशी मनाना,
ये भी हैं अति उत्तम ।।
पर दीवाली रहे अधूरी,
जबतक हृदय कलुषित हैं।
आत्मशोधन, आत्मउन्नति का,
ये सबसे उत्तम दिन हैं।।
ये तिथि आत्मोलोकन का हैं,
ये दिन स्वयं को गढ़ने का।
भूल के अपना और पराया,
सबको ऊर्जित करने का ।।
दीप जलाओ दिल के भीतर,
कोना कोई न काला हो।
अपनाओ हर दबे-कुचले को,
जिसका कोई न अपना हो ।।
मन की कटुता, ईर्ष्या छोड़ के,
प्रेमभाव को फैलाओ।
किसी गरीब के कुटी में जा के,
एक दीपक जलाओगे ।।

भाग -३

कलियुग के प्रभाव में,
सब कुछ बदल रहा हैं।
प्रतिस्पर्धा और कुप्रभाव में,
हिन्दू सदकृत लुप्त हो रहा हैं ।।
सनातनी सदपरंपरा,
क्षय होने को हैं।
मूल तीज-त्यौहार सभी,
आज मिटने को हैं।।
था विचार चिरपुरातन,
हर पर्व के पीछे।
भोग नहीं, तप, त्याग,
छिपा था पर्व-त्यौहार के पीछे।।
हर्षोल्लास और मादकता,
न सनातनी हैं ।
परम्परा वो पुरखों का
कब भोगमयी हैं ?
हम हिन्दू का भोग भी,
सुख देने वाला था।
सनातनी का हर कर्म,
त्याग से भरा हुआ था।।
ज्ञान से परिपूर्ण हर कर्म,
धर्म के मूल से प्लावित था ।

 

मानवता का अंकुरण

स्वयं से लड़ते रहो,
संघर्ष जब तक ‘मैं’ से हो।
स्वयं को गढ़ते रहो,
सांसों की डोर जब तक हो।।
स्वयं में त्रुटि दिखे ना,
चोर तब तक तुम ही हो।
दूसरों की बात छोड़ो,
त्रुटिपूर्ण तुम ही हो।।
हैं कई संघर्ष बाहर,
उसपे ध्यान मत दो तुम।
हैं कई आश्चर्य भव में,
उसपे कान मत दो तुम।।
हैं कई अनसुलझी बातें,
जीवन भी एक खेल हैं।
इसलिए अपने को साधो,
सब कुछ यहाँ बे-मेल हैं।।
आत्मचिंतन से करो,
इस आत्मा की उन्नति।
आत्ममंथन से करो,
क्या हैं अपनी विसंगति?
आत्मचिंतन की ये राह,
अन्तःकरण को जाती हैं।
स्वयं में त्रुटि ही त्रुटि,
खोज के ले आती हैं।।
त्रुटियों का शोधन करके,
स्वयं का शोधन करो ।
भूल, कुकर्म जो हुआ हैं,
पश्चाताप से भरो।।
मन को ऐसे साधो की,
इन्द्रियों पर अधिकार हो।
प्राण भी हिलने न पाये,
मन का ये वर्चस्व हो।।
मन को इतना ताड़ दो,
तन-मन का भेद शून्य हो।
धर्म की डोरी उठा के,
कर्म का संधान हो।।

 

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