आनंदातिरेक-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

आनंदातिरेक-नील कुसुम -रामधारी सिंह ‘दिनकर’ -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Ramdhari Singh Dinkar

आनन्द का अतिरेक यह ।

हो मृत्यु की धारा अगर तो मुक्त बहने दो मुझे;
हो जिन्दगी की छाँह तो निस्पन्द रहने दो मुझे ।

कुछ और पाना व्यर्थ है,
अन्यत्र जाना व्यर्थ है ।

माँगा बहुत तुम से, नहीं कुछ और माँगूंगा;
अब इस महामधु-पूर्ण निद्रा से न जागूंगा ।

नींद है वह जागरण जब फूल खिलते हों;
चेतना के सिन्धु में निश्चेत प्राणों को;
ऊर्मियों में फूटते-से गान मिलते हों।

मीठा बहुत उल्लास यह, मादक बहुत अविवेक यह
निस्सीम नभ, सागर अगम आनन्द का अतिरेक यह ।

(१९५४ ई०)

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