आदिम-अन्तिम-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey 

आदिम-अन्तिम-स्मृति सत्ता भविष्यत् -विष्णु दे -Hindi Poetry-कविता-Hindi Poem | Kavita Vishnu Dey

 

उस के चरणों में है अशोक पलाश,
मैं ढोता हैं विवर्ण शिशिर ।
उस की आँखों में होली की रात है,
मैं माघी भोर का आकाश हूँ।

उस की देह में आदिम गौरव है,
मैं ढोता हूँ अन्तिम तुषार,
उस की हंसी अलका का सम्भार है
और मैं स्मृति का रौरव हूँ।

क्या वह आश्विन को लांघ कर आयेगी,
मैं क्या फिर फाल्गुन में लौट जाऊंगा?
क्या काल को गिन कर काल जीत लूंगा,
एक रात क्या दूसरा दिन पा जायेगी?

१२/३/५८

 

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